मुसलमानों के दो प्रमुख वर्ग हैं – सुन्नी और शिया। मुहर्रम शिया वर्ग के मुसलमानों द्वारा मनाया जाता है। इसके पीछे इतिहास है। पैगम्बर मुहम्मद साहब की बेटी बीबी फातिमा के बेटों हसन और हुसैन को उनके विरोधयों ने कर्बला के मैदान में युद्ध करते समय केवल पराजित ही नहीं किया, उन्हें प्यास से तडपा -तडपा कर मार डाला। जब न शहीदों का घोड़ा अपने सवार के बना युद्ध-क्षेत्र से भागकर उनके अनुयायियों के पास पहुँचा तो वे गहरे शोक में डूब गये। मुहर्रम मुहम्मद साहब के नवासों हसन और हुसैन की क्रूर हत्या और शहादत की स्मृति में अपना गम और गुस्सा प्रकट करने के लिए मनाया जाता है।
इस्लाम धर्म के अनुयायी हिजरी संवत् मानते हैं, उनकी तिथि-गणना का आधार चाँद का दिखाई देना होता है। अतः उनके अन्य त्यौहारों की तरह मुहर्रम की भी कोई निश्चित तिथि या निश्चित महीना नहीं है। मुहर्रम का विशेष आकर्षण होते हैं रंग-बिरंगे काजग, पन्नियों के बने ताजिये। ये विशेष आकार-प्रकार और रंग-रूप वाले होते हैं। एक निश्चित स्थान से शिया वर्ग के लोग इन ताजियों का जुलूस निकल कर चलते हैं। पहले कुरान की आयतें पढ़ी जाती हैं फिर जुलूस में भाग लेनेवाले अपने कंधों पर या ठेलों पर ताजिये रखकर कर्बला की ओर चल पड़ते हैं। जुलूस में ताजियों के आगे-पीछे बच्चे, बूढ़े, जवान हर आयु-वर्ग के लोग रोते-पीटते, छातियों को, पीठों को जंजीरों से लहु-लुहान करते, हाय हुसैन… हम न हुए के, या हुसैन, या अली के शोक में डूबे नारे लगाते हुए चलते हैं। गली-मुहल्लों से गुजरते इन ताजियों तथा शोकार्त व्यक्तियों की लुह-लुहान पसीने से तर देहों को देखकर, उनके द्वारा गाये जानेवाले करुणा भरे मर्सियों को सुनकर सब की आँखें अश्रुपूरित हो जाती हैं। सारा वातावरण अत्यन्त शोकपूर्ण और करुणोत्पाद्क होता है। ताजियों के जुलूस में भाग लेनेवालों की प्यास बुझाने के लिए मार्ग में कहीं-कहीं पानी पिलाने की व्यवथा भी की जाती है, पर शोक-विह्वल धार्मिक वृत्ति के लोग पानी की बूँद नहीं पीते। उनके दिमाग में यह बात जमी रहती है कि हुसैन साहब को युद्ध के मैदान में चाहने-माँगने पर भी दुश्मनों ने पानी नहीं दिया था और वे प्यासे मर गये थे। यह घोड़ा हुसैन साहब के घोड़े का तथा चादर उनके खून बहाकर शहीद होने का प्रतिक हैं। मुहर्रम का यह जुलूस और जातियों का लाव-लश्कर भिन्न-भिन्न गलियों, बाजारों, बस्तियों से गुजरता हुआ अन्त में एक स्थान पर पहुँचता है जिसे कर्बला कहा जाता है। वहाँ पहुँचने पर अन्तिम फातिहा पढ़ा जाता है, करुणा-भरे मर्सिए (शोक गीत) गाते हुए इन ताजियों को दफन कर दिया जाता है। ताजिए दफन करने का अर्थ है शहीद होनेवाले हसन-हुसैन को अन्तिम विदा देना, उनकी अन्त्येष्टि करना।
वस्तुतः यह त्यौहार त्याग, बलिदान, धर्म के लिए, अपने सिद्धान्तों के लिए शहीद होनेवालों के प्रति श्रद्धा-भक्ति प्रकट करने का, उनकी पावन स्मृति में मनाया जाता है और सन्देस देता है कि त्याग-बलिदान, निष्ठा का मार्ग ही सन्मार्ग है।
आज साम्प्रदायिक वैमनस्य इतना बढ़ गया है, लोग इतने संकीर्ण वृत्ति हे हो गये हैं कि इस पावन पर्व के अवसर पर भी झगड़ा-फसाद, रक्तपात, हिंसा करने से बाज नहीं आते। मुहर्रम के अवसर पर प्रायः लखनऊ में शिया-सुन्नियों के बीच झड़प हो जाती है और पाकिस्तान में शिया लोगों को गैर-मुस्लिम मानकर उन्हें तरह-तरह से अत्पीडित किया जाता है।
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