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संयुक्त राष्ट्र संघ: अंतरराष्ट्रीय संगठन पर विद्यार्थियों के लिए निबंध

अंतरराष्ट्रीय संगठन – संयुक्त राष्ट्र संघ पर विद्यार्थियों के लिए हिंदी निबंध

प्रथम महायुद्ध की विभीषिका, नर-संहार, नगरों के विनाश को देखकर लगा कि आगामी युद्धों के कारण मानव जाती का अस्तित्व ही खतरे में पड़ सकता है क्योंकि युद्ध में तो अपार जन-धन की हानी होती ही है, उसके उपरान्त भी ऐसी समस्याएँ उठ खड़ी होती हैं जिनके कारण सुख-शान्ति विनष्ट हो जाते हैं। अतः उस समय के अमेरिका के राष्ट्रपति विलसन के मस्तिष्क में एक ऐसे विश्वसंगठन का विचार उत्पन्न हुआ जिसके प्रयासों से विश्व में शान्ति बनी रहे और संसार के देश परस्पर युद्धों में अपने संसाधनों और जनशक्ति का विनाश करने की बजाय विकास के कार्यों में अपनी प्रतिभा, शक्ति, संसाधनों का उपयोग करें। 1919 ई. में उन्होंने चौदह सूत्रीय योजना प्रस्तुत की और ‘लीग ऑफ नेशन्स’ की स्थापना हुई। परन्तु 20 वर्ष भी नहीं बीते थे कि 1939 ई. में जर्मनी के हिटलर, इटली के मुसौलिनी तथा जापान की महत्वाकांक्षाओं और शक्ति-मद के कारण पुनः युद्ध छिड़ गया जिसे द्वितीय महायुद्ध कहा जाता है। इस युद्ध में पहले युद्ध से भी अधिक नर-संहार तथा जन-धन की क्षति हुई। युद्ध के अंतिम चरण में जब अमेरिका ने जापान के नागासाकी तथा हिरोशीमा पर अणु बम बरसाये और उनके कारण हुआ प्रलयंकारी विनाश देखा तो सबने अनुभव किया कि यदि तीसरा विश्व युद्ध हुआ तो उसमें अणु बम से भी अधिक विनाशकारी अस्त्र-शस्त्रों का प्रयोग होगा और परिणाम होगा सम्पूर्ण सृष्टि का विनाश, मानव जाती का अन्त। अतः युद्ध समाप्त होने पर, एंग्लो-अमरीकी गुट (जिसे मित्र राष्ट्र कहा गया था) की ध्रुव राष्ट्रों जर्मनी, इटली, जापान पर विजय होने पर अमेरिका के राष्ट्रपतियों प्रेजिडेंट रूजवेल्ट और ट्रमैन ने पुनः एक संस्था बनाने का प्रस्ताव रखा। 14 अप्रैल 1945 को विश्व के पचास देशों के प्रतिनिधियों की सैन फ्रांसिस्को नामक स्थान पर बैठक हुई और लीग नेशन्स के स्थान पर संयुक्त राष्ट संघ UNO (यू.एन. ओ.) की स्थापना हुई।

संयुक्त राष्ट्र संघ के निम्नलिखित उद्देश्य थे:

  1. विश्व शान्ति और सुरक्षा बनाये रखना।
  2. विवादों के कारणों को दूर करना और विवाद होने पर उनको सुलझाना, राष्ट्रों के बीच मैत्रीभाव स्थापित करना।
  3. विश्व का आर्थिक विकास करना।
  4. मानव जाती के स्वास्थ्य, सांस्कृति आदि की रक्षा करना।
  5. आर्थिक, सामजिक, सांस्कृतिक सम्बन्धों को सुदृढ़ बनाना, अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग को बढ़ावा देना।
  6. विश्व की शान्ति भंग करने वाले राष्ट्रों के विरुद्ध राजनैतिक और यदि आवश्यक हो तो सैनिक कार्यवाही करना।
  7. अन्तर्राष्ट्रीय विवादों को सुलझाना।

इन्हीं उद्देश्यों की पूर्ति के लिए, मुख्यतः शान्ति-भंग का खतरा उत्पन्न होने पर, दो राष्ट्रों के बीच तनाव होने पर मध्यस्थ के रूप में समस्या को हल करना। इसके लिए संयुक्त राष्ट्र संघ के अन्तर्गत अन्य उप-संस्थाएँ गठित की गईं। ये हैं – जनरल असैम्बली, सुरक्षा परिषद्, अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय, अन्न एवं कृषि संगठन, अन्तर्राष्ट्रीय पुनर्निर्माण एवं विकास बैंक, विश्व स्वास्थ्य संगठन, संयुक्त राष्ट्र आर्थिक-सामाजिक एवं सांस्कृतिक संगठन। इनमें सर्वाधिक महत्वपूर्ण एवं सर्वोच्च संस्था है जनरल असैम्बली। प्रत्येक अन्तर्राष्ट्रीय समस्या का अंतिम समाधान यही करती है। दो तिहाई मत वाला निर्णय सबको मानना पड़ता है। सामान्यतः इसका अधिवेशन वर्ष में एक बार होता है पर यदि कुछ देश अनुरोध करें तो दूसरा-तीसरा अधिवेशन भी बुलाया जा सकता है। इसका अध्यक्ष प्रति वर्ष अलग-अलग राष्ट्रों का प्रतिनिधि होता है। इसका मुख्य कार्यालय अमेरिका के नगर न्यूयार्क में है। इसके वार्षिक अधिवेशन में सभी सदस्य राष्ट्रों के प्रतिनिधि भाग लेते तथा अपने विचार प्रकट करते हैं।

संयुक्त राष्ट्र संघ की दूसरी महत्वपूर्ण संस्था है सुरक्षा परिषद् (Security Council)। इसके पाँच सदस्य-अमेरिका, रूस, चीन, इंग्लैण्ड और फ्रांस स्थायी हैं। शेष छः सदस्य निर्वाचित होते हैं। स्थायी सदस्यों को वीटो विशेष अधिकार प्राप्त है अर्थात् एक अकेला देश अन्य देशों द्वारा अनुमोदित प्रस्ताव को ठुकरा सकता है। इस अधिकार के कारण पाँच में से कोई एक देश भी किये धरे पर पानी फेर सकता है। विश्व के बदलते परिदृश्य को देखते हुए इसके सदस्यों की संख्या बढ़ाने की माँग जोर पकड़ती जा रही है। भारत भी इसका सदस्य बनने के लिए अन्य राष्ट्रों से सहयोग माँग रहा है और कई देशों ने अवसर आने पर उसको सदस्य बनाने का वचन भी दे रखा है। इस प्रकार संयुक्त राष्ट्र संघ तथा उसकी उपसंस्थाएँ विश्व में शान्ति बनाये रखने और विभिन्न राष्ट्रों के विकास के लिए तरह-तरह के कार्य कर रही हैं। विश्व-मानवता का हित-साधन करना ही संयुक्त राष्ट्र संघ का लक्ष्य है।

अब विचार करना है कि संयुक्त राष्ट्र संघ अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने तथा विश्व का हित-साधन करने में कितना सफल हुआ है। यह सच है कि उसके प्रयसों के परिणामस्वरूप तीसरा युद्ध नहीं हुआ है, जब-जब तीसरे युद्ध के संकट के बादल घहराये हैं, उसके प्रयत्नों से वे टाल दिये गये हैं। छोटे-मोटे युद्धों और संघर्षों के समय भी उसकी भूमिका महत्त्वपूर्ण रही है। डच-इंडोनेशिया का झगड़ा, स्वेज नहर का मसला, अफ्रीका की रंगभेद की समस्या, पैलेस्टाइन-इजरायिल संघर्ष को समाप्त करने आदि के कार्यों को उसकी उपलब्धि या सफलता माना जा सकता है। यूनेस्को ने राष्ट्रों के बीच सांस्कृतिक सम्बन्ध दृढ करने में सहायता की है, विश्व बैंक ने गरीब और जरूरतमंद राष्ट्रों को आर्थिक सहायता देकर उन्हें आर्थिक संकट से उभारा है, विश्व स्वास्थ्य संगठन की शाखाएँ विभिन्न देशों में स्वास्थ्य-सम्बन्धी प्रशंसनीय कार्य कर रही हैं। हाँ, विश्व न्यायालय का कार्य संतोषजनक नहीं है। वहाँ प्रस्तुत झगड़ा या तो वर्षों लटका रहता है अथवा किसी शक्तिशाली राष्ट्र विशेषतः अमेरिका के दबाव के कारण न्याय नहीं होता।

निःशस्त्रीकरण और परमाणु परीक्षणों पर रोक सम्बन्धी प्रयत्न असफल रहे हैं। अस्त्र-शस्त्रों को होड़ कम होने की बजाय बढ़ रही है, विध्वंस आंशिक और दिखावे कके लिए किया गया है, परमाणु शक्ति प्रसार पर सभी देशों ने हस्ताक्षर नहीं किये हैं। परिणाम यह है कि यदि तीसरा युद्ध नहीं हुआ है, तो उसका श्रेय संयुक्त राष्ट्र संघ को नहीं राष्ट्रों में व्याप्त इस भय और आशंका को है कि तृतीय युद्ध छिड़ने पर मानव जाती का ही नाश हो जायेगा। संयुक्त राष्ट्र संघ की असफलता का कारण पहले था विश्व की दो महानतम शक्तियाँ- रूस और अमेरिका में प्रतिस्पर्धा तथा शीतयुद्ध। सोवियत संघ के विघटन के बाद अमेरिका के एक मात्र विश्व-शक्ति बन जाने के बाद अमेरिका की दादागिरी इस असफलता का मुख्य कारण है। ईराक पर एकतरफा आक्रमण करना, झूठे आरोप लगाकर उसका विध्वंस करने के लिए युद्ध थोपना, उसके बाद उसका ईराक पर शासन तथा भविष्य में भी वहाँ अपना आधिपत्य जमाये रखने की योजना ताकि ईराक के तेल के कुओं पर उसका अधिकार रहे, संयक्त राष्ट्र संघ की अनुमति के बिना भी कार्य करते रहना और इस विश्व-संस्था को कमजोर बनाना अमरीका की दादागिरी के ही उदाहरण हैं। ईराक के साथ अमेरिका ने जो आचरण किया है, संयुक्त राष्ट्र संघ की जो अवमानना की है, उससे लगता है कि संयुक्त राष्ट्र संघ का भविष्य उज्ज्वल नहीं है, उसकी भी वही दशा होगी जो लीग ऑफ नेशन्स की हुई थी।

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