Sunday , May 31 2020
शिक्षक दिवस

शिक्षक दिवस पर निबंध विद्यार्थियों के लिए

शिक्षक दिवस पर निबंध विद्यार्थियों के लिए
[750 Words]

बीसवीं शताब्दी के विश्व-भर के मनीषियों में भारत के डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णनन का नाम उल्लेखनीय है। प्राच्य विद्या एवं दर्शनशास्त्र में गहरी पैठ, मौलिक चिन्तन तथा वक्तृत्वकला के लिए विख्यात डॉ. राधाकृष्णनन काशी विश्वविद्यालय के दर्शनशास्त्र विभाग में अध्यापक थे। उनके द्वारा लिखे गये ग्रन्थों को पढकर तथा उनके पांडित्य के सम्बन्ध में जानकर विदेशों के विश्वविद्यालय एवं प्राच्यविद्या अध्ययन केन्द्र उन्हें अपने यहाँ आकर भाषण देने के लिए आमंत्रित किया करते थे। उनकी उपस्थिति का लाभ उठाकर विदेशों के विद्वान उनसे दर्शनशास्त्र की जटिल समस्याओं पर विचार-विमर्श भी करते थे। उनकी भाषण-माला के व्याख्यान सुनने तथा गोष्ठियों में भाग लेने के लिए असंख्य जिज्ञासु उपस्थित रहते थे। डॉ. राधाकृष्णनन का व्यक्तित्व बहुआयामी था – वह लोकप्रिय अध्यापक, प्राच्यविद्या विशारद, गम्भीर चिन्तक और महान दार्शनिक तो थे ही, प्रभावशाली वक्ता, सन्तुलित विचारोंवाले राजनेता और कुशल प्रशासक भी थे। उनके इन गुणों का परिचय तब मिला जब उनके पांडित्य, विश्व-ख्याति और गम्भीर व्यक्तित्व का सम्मान करते हुए उन्हें पहले भारत का प्रथम उपराष्ट्रपति तथा बाद में बाबू राजेन्द्र प्रसाद के बाद राष्ट्रपति बनाया गया। वह चाहे जिस पद पर रहे: अध्यापक, उपराष्ट्रपति या उपराष्ट्रपति या राष्ट्रपति सब की गरिमा उनके व्यक्तित्व, आचार-व्यवहार एवं कार्य-शैली से बढ़ी। उनका यश देश की सीमाओं को पार कर विदेशों तक पहुँचा और सबके श्रद्धा-भाजन बने रहे। इस गरिमामंडित, महान दार्शनिक एवं लोकप्रिय अध्यापक का जन्मदिन 30 सितम्बर शिक्षक-दिवस के रूप में मनाया जाता है।

शिक्षक का अर्थ है शिक्षा देनेवाला व्यक्ति। प्राचीन काल में शिक्षा गुरुकुलों में दी जाती थी और गुरुकुल की व्यवस्था जिसके हाथों में होती थी उसे गुरु कहा जाता था। शिक्षा और ज्ञान का भारतीय संस्कृति में अपूर्व महत्त्व है इसलिए यहाँ शिक्षक, अध्यापक, गुरु को मान-सम्मान का पात्र समझा जाता रहा है। गुरु को ईश्वर से भी अधिक महत्त्व दिया गया है। संत कबीर गोविन्द का दर्शन कराता है। ‘बलिहारी गुरु आपणें जिन गोविन्द दियौ दिखाय।’ भारत के शास्त्र-ग्रन्थ भी गुरु को ब्रह्मा, विष्णु, महेश से ऊपर मानते हैं:

गुरु ब्रह्मा, गुरु विष्णु, गुरु देवो महेश्वरः
गुरु साक्षात् परम ब्रह्मः तस्मै श्री गुरुवे नमः।

आधुनिक काल में न गुरुकुल हैं, न वह ज्ञान की पिपासा जो प्राचीन भारत में थी। आज शिक्षा व्यवसाय बन गई है। विद्यार्थी और अध्यापक का सम्बन्ध सौदा खरीदनेवाले और बेचनेवाले का हो गया है। यह स्थिति अत्यन्त शोचनीय है। इसे सुधारने के लिए प्रयास होने चाहिएँ और इस कार्य में कुछ योगदान दे सकता है भारत में प्रतिवर्ष मनाया जानेवाला शिक्षक-दिवस। आवश्यकता इस बात की है कि औपचारिक बन कर न रह जाये, केवल रस्म-अदायगी बन कर न रह जाये। शिक्षा को व्यवसाय मात्र, आजीविका उपार्जन का एक साधन मात्र न मानकर एक पवित्र सांस्कृतिक, ज्ञानवर्धक, राष्ट्रीय महत्त्व का कार्य माना जाये। यदि शिक्षक इस दायित्व को समझ कर कार्य करें तो उन्हें अपनी पुरानी खोई प्रतिष्ठा, गरिमा, आदर-सम्मान स्वतः प्राप्त हो जायेगा।

खेद है कि शिक्षक दिवस मनाने का आयोजन केवल विद्यालयों में किया जाता है, महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों के स्तर पर नहीं मनाया जाता जबकि आवश्यकता इस बात की है कि पाठशालाओं से लेकर विश्वविद्यालयों तक के अध्यापकों को उनके कर्त्तव्य तथा दायित्व का स्मरण कराकर उन्हें आदर्श शिक्षक बनने की प्रेरणा दी जाये।

जिस रूप में शिक्षक-दिवस आज मनाया जाता है वह शिक्षक-वर्ग के प्रति सम्मान प्रकट करने के लिए आयोजित किया जाता है। विद्यालय प्रायः बन्द रहते हैं जबकि होना यह चाहिए कि उनमें शैक्षिक और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किये जायें। शिक्षक किसी निर्धारित स्थान विद्यालय, सभागार, आदि में एकत्र होते हैं, शिक्षा का स्तर और समाज में शिक्षक का मान-सम्मान कैसे सुधरे इस पर भाषण होते हैं, विचार-विमर्श होता है, संगोष्ठीयाँ आयोजित की जाती हैं। परन्तु यह सब बौद्धिक व्यायाम मात्र होता है। कहीं-कहीं रैलियाँ और जुलूस निकाले जाते हैं और उनमें अधिकारों की माँग की जाती है, अतिरिक्त सुविधाएँ प्रदान की जायें, इस बात पर सारा ध्यान केन्द्रित रहता है, कर्त्तव्य-दायित्व की चर्चा कम होती है। महामहिम राष्ट्रपति जी शिक्षा के कुछ क्षेत्रों-प्रौढ़ शिक्षा, नारी-शिक्षा, बाल-शिक्षा में उल्लेखनीय सेवा के लिए कुछ शिक्षकों को अलंकृत-पुरस्कृत करते हैं। कुछ अध्यापकों को उनके छात्रों के साथ मैत्रीपूर्ण, आदर्श आचरण के लिए, लोकप्रियता के लिए, परीक्षा-परिणामों के लिए भी पुरस्कार दिये जाते हैं।

शिक्षक राष्ट्र के निर्माता कहे जाते है, छात्रों के रूप में भावी नागरिकों के निर्माण का महत्त्वपूर्ण कार्य उन्हें सौंपा जाता है। आवश्यकता इस बात की है शिक्षक केवल पुरस्कार पाने के अपने कर्त्तव्य का पालन न करें अपितु इसे राष्ट्र-सेवा का, देश की प्रगति का कार्य समझ कर, उसे अपना दायित्व मानकर शिक्षण-कार्य करें। उनका कार्य केवल पुस्तकीय शिक्षा देना नहीं है; सामान्य ज्ञान, व्यवहारकुशलता, राष्ट्र के प्रति नागरिक का कर्तव्यपरायण बनने की प्रेरणा देना भी उनका कर्त्तव्य है। यह कर्तव्य निबाह कर ही वह शिक्षक-दिवस को सार्थक बना सकते हैं।

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