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HIV/AIDS Essay

एड्स पर निबंध विद्यार्थियों के लिए

एड्‌स ‘एक्वायर्ड इम्यून डेफिसिएन्सी सिंड्रोम’ का संक्षिप्त नाम है। यह एक असाध्य बीमारी है, जिसे पिछली सदी के अस्सी के दशक के पूर्व कोई भी नहीं जानता था। इस बीमारी का आभास सर्वप्रथम 1981 ई. में अमेरिका में हुआ, जब पाँच समलिंगी पुरुषों में इस अनोखी बीमारी के लक्षण पाए गए।

यद्‌यपि इसका आरंभ अमेरिका में हुआ, परंतु इसकी जानकारी के लगभग आठ वर्ष पश्चात्, 1989 ई. में ‘विश्व स्वास्थ्य संगठन’ की एक गणना के अनुसार 1,40,000 से भी अधिक लोग इस बीमारी के शिकार पाए गए। 1997 ई. में यह संख्या बढ्‌कर 1,5,44,067 हो गई। आज केवल भारत में ही लगभग पचास लाख एच. आई. वी. संक्रमित व्यक्ति निवास कर रहे हैं।

एड्‌स मूलत: एच. आई. वी. अर्थात् ‘ह्‌यूमन एम्यूनो डेफिसिएन्सी वायरस’ से होती है। आज वास्तविकता यह है कि जिस रफ्तार से इसके जीवाणुओं से विश्वभर में लोग बाधित हो रहे हैं यह निकट भविष्य में मानव सभ्यता के लिए एक बड़ा खतरा बन सकता है। प्रतिदिन लगभग 7000 से भी अधिक लोग इस जीवाणु से ग्रसित हो सकते हैं।

एड्‌स वास्तविक रूप में किसी एक बीमारी का नाम नहीं है अपितु यह अनेक प्रकार के रोगों का समूह है जो विशिष्ट जीवाणुओं के द्‌वारा मनुष्य की प्रतिरोधक क्षमता को नष्ट करने से उत्पन्न होती है। यह आवश्यक नहीं है कि ‘एच. आई. वी.’ से ग्रसित सभी मनुष्य एड्‌स के रोगी हैं। इस जीवाणु से ग्रसित लोगों में ‘एड्‌स’ को पूर्णत: विकसित होने में 7 से 10 वर्ष तक लग सकते हैं।

विकसित देशों की तुलना में विकासशील देशों में ‘एड्‌स’ का रोग जल्दी विकसित होता है क्योंकि इन देशों के नागरिकों का खान-पान व स्वास्थ्य का स्तर अत्यंत निम्न है। केवल आयरलैंड, दक्षिण अफ्रीका, चीन और भारत में विश्व के 80% से भी अधिक ‘एच. आई. वी.’ ग्रसित लोग पाए जाते हैं।

मनुष्यों में ‘एच. आई. वी.’ अथवा ‘एड्‌स’ कुछ प्रमुख कारणों से ही फैलता है। एच. आई. वी. प्रमुखत: अवैध यौन संबंधों से फैलता है। किसी भी युग्म का एक सदस्य यदि ‘एच. आई. वी.’ बाधित है तो यौन संबंधों द्‌वारा दूसरा सदस्य भी बाधित हो जाता है। स्त्रियों में इस रोग के फैलने की संभावना पुरुषों की अपेक्षा अधिक होती है। इसके अतिरिक्त ‘एच. आई. वी.’ जीवाणुओं से ग्रसित सुई के द्‌वारा अथवा बाधित स्त्रियों के गर्भ से होने वाली संतान में भी इस रोग के लक्षण हो सकते हैं।

उपरोक्त कारणों के अतिरिक्त किसी भी अन्य कारण, जैसे – ‘एच. आई. वी.’ अथवा एड्स से ग्रसित व्यक्ति के साथ बैठने, खाने अथवा उसकी देखरेख करने आदि से एड्स नहीं फैलता है। ‘एड्‌स’ अभी तक एक लाइलाज बीमारी है जिससे सामाजिक असंतुलन का नया खतरा उत्पन्न हो गया है। यह प्राय: मनुष्य में उस समय प्रविष्ट होती है जब उसमें सबसे अधिक ऊर्जा होती है। एक बार मनुष्य इस जीवाणु से ग्रसित होता है तब धीरे-धीरे उसकी ऊर्जा व प्रतिरोधक क्षमता विलीन होती जाती है।

एड्‌स से बचाव ही इसका उपाय है। इसके लिए आवश्यक है कि इस रोग के फैलने के कारणों की जानकारी जन-जन तक पहुँचे। शिक्षा के द्‌वारा समाज में सुरक्षित यौन संबंधों को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। सुरक्षित यौन संबंधों के लिए ‘कंडोम’ अथवा निरोधक रक्तदान अथवा सुरक्षित सुई का प्रयोग कर हम एड्‌स के विस्तार को नियंत्रित कर सकते हैं।

‘एड्‌स’ जैसे असाध्य रोगों का स्थायी समाधान ढूँढ निकालने के लिए विश्वभर के वैज्ञानिक अनुसंधान कार्य कर रहे हैं। इसे रोकना विश्व के समस्त लोगों, समाज, परिवार, स्वयंसेवी संस्थानों व अन्य वर्गों की जिम्मेदारी है। व्यक्ति को स्वयं अपनी जिम्मेदारी समझनी चाहिए कि वह इसके बचाव का हरसंभव उपाय करेगा।

समाज ‘एच. आई. वी.’ अथवा एड्‌स बाधित व्यक्ति के बाहिष्कार के बजाय उसके प्रति सकारात्मक व सहानुभूतिपूर्ण बर्ताव रख सकता है। इसके अतिरिक्त सभी पत्र-पत्रिकाएँ व संचार के साधन इसके नियंत्रण में प्रमुख भूमिका निभा सकते हैं।

‘एड्‌स’ संबंधी जानकारी के लिए भारत सरकार समय-समय पर प्रचार माध्यमों द्‌वारा अनेक कार्यक्रम जारी करती रहती है। इसके अतिरिक्त ‘विश्व स्वास्थ्य संगठन’ द्‌वारा किए गए प्रयास सराहनीय हैं। सारांशत: हम कह सकते हैं कि ‘एड्‌स की जानकारी ही इससे बचाव है’।

हम स्वयं एड्‌स के बारे में सभी जानकारियाँ ग्रहण करें तथा अन्य लोगों को भी इनसे बचाव हेतु प्रेरित करें। एड्‌स के प्रचार-प्रसार में सही जानकारी का न होना मुख्य कारण रहा है, अत: हमारा सर्वाधिक जोर इस बाधा को दूर करना होना चाहिए।

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