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आदर्श विद्यार्थी पर निबंध Hindi Essay on Ideal Student

मित्रता पर विद्यार्थियों और बच्चों के लिए निबंध

किसी अनुभवी व्यक्ति ने इस संसार को गोरख-धन्धा ठीक ही बताया है। जिस प्रकार पुरुष के भाग्य और स्त्री के चरित्र को समझना देवताओं तक के लिए कठिन है:

“पुरुषस्य भाग्यं नारी चरित्रं देवो न जानाति कुतोः मनुष्यः”

उसी प्रकार इस संसार की गति को समझना दुष्कर है। कविवर जायसी ने इसीलिए इसे दुनिया-धन्धा कहा है। यहाँ कदम-कदम पर आपको प्रलोभन, छल-कपट, धोखाधड़ी, मक्कारी, मीठी-मीठी बातें करनेवाले, हंस के रूप में बगुले तथा भेड़ की खाल ओढ़े भेड़िये तो मिल जाएँगे, पर निस्वार्थ भाव से सहायता करनेवाले सच्चे मित्रों का अभाव ही है। आपका परिचय हजारों से होता है, घनिष्टता पचासों से होती है, पर मित्र कहे जानेवाले व्यक्ति चार-छह ही होते हैं। आजकल के भौतिकतावादी, उपभोक्ता संस्कृतिवाले दूषित वातावरण में प्रत्येक व्यक्ति निजी हानी-लाभ, स्वार्थ को देखता है और उसके लिए छल-कपट, चालाकी, धूर्तता, मक्कारी को ही रामबाण औषधि समझता है। अतः बगुलों में हंस की पहचान करना कठिन है।

सच्चे मित्र की पहचान बताते हुए महाकवि तुलसीदास ने कुछ बातें कही हैं जो उनके युग में ही नहीं आज भी सत्य हैं – अपने दुःख को कम समझना, मित्र के दुःख को अधिक मान कर उसकी सहायता करना, मार्ग-दर्शन करना, सुपथ पर चलने की प्रेरणा देना तथा कुमार्ग पर चलने से रोकना, लेन-देन में शंका न रखना, विपत्ति के समय सौगुना स्नेह प्रकट करना। उन्होंने नकली, ढोंगी मित्र के लक्षण भी बताये हैं – जो सामने कोमल और मधुर वचन बोले, पीठ पीछे निन्दा करे, स्वयं को हितैषी बताते हुए पीठ में छुरा भौंके, जिसका मन साँप की चाल के समान टेढ़ा हो वह कुमित्र है और उसे त्यागने में ही भलाई है। तुलसी न अन्यत्र भी सच्चे मित्र की पहचान बताते हुए लिखा है कि सच्चे मित्र की पहचान आपत्ति पड़ने पर ही होती है:

धीरज, धर्म, मित्र अरु नारी
आपद् काल परखिए चारी।

ठीक, ऐसे ही विचार अंग्रेजी की प्रसिद्ध उक्ति ‘A friends in need is a friend in need‘ में तथा रहीम की निम्नलिखित पंक्तियों में कहे गये हैं:

सुख सम्पदा में सगे, बनत बहुत बहु रीती
विपत्ति-कसौटी जो कसे, ते ही साँचे मीत।

संस्कृत नीतिशास्त्र की एक प्रसिद्ध उक्ति है:

‘राजद्वारे च श्माशाने यो तिष्ठति सः बान्धवः’

अर्थात् जो सुख के दिनों में ही नहीं विपत्ति के समय भी कन्धे से कान्धा मिलाकर आपका साथ दे, वही सच्चा बन्धु या मित्र होता है। केवल सुख-सम्पत्ति के दिनों में मौजमस्ती करनेवाला, दुःख – विपत्ति के समय आँखें चुराकर मुँह फेर लेनेवाला व्यक्ति कपटी मित्र होता है।

“पैसा रहा न पास, यार मुख से नहीं बोले।”

ऐसे लोग संसार में बहुत हैं:

“स्वारथ लागि करै सब प्रीति।”

सच्चा मित्र बड़े भाग्य से मिलता है और वह अपने साथी की सहायता निःस्वार्थ भाव से करता है। प्रायः कहा जाता है कि विवाह, बैर और प्रीति समान स्तरवाले से ही करनी चाहीए, पर मित्रता से सम्बन्ध में यह सत्य नहीं क्योंकि वह अहेतुक होती है – कृष्ण और सुदामा, राम और सुग्रीव की मित्रता ऐसी ही थी। कृष्ण थे द्वारिकाधीश और सुदामा तथा नितान्त दरिद्र, “ब्राह्मण कौ धन केवल भिक्षा” माननेवाला दिन-हिन विप्र जिसके पास फटी दुपटी एवं लटुकी मात्र थी, जिसके पैर नंगे थे और ‘सीस पगा न झगा तन में‘ और जिसकी दरिद्रय से पीड़ित होकर अपने मित्र के पैर गंगाजल से न धोकर अपने अश्रुजल से धोये और उनके अनजान में ही उनकी टूटी-फूटी कुटिया को राजमहल बना दिया। सुग्रीव ने अपनी वानर-भल्लूक की सेना से राम की सहायता कर महारानी सीता को रावण के कारागार से मुक्त करवाया। सज्जन और दुर्जन की मित्रता में वही अन्तर है जो दिन के पूर्वार्द्ध तथा उत्तरार्ध की छाया में-दुर्जन की छाया दिन के पूर्वार्द्ध की छाया की तरह पहले सघन होती है और फिर धीरे-धीरे क्षीण होती जाती है जबकि सज्जन की सच्ची मित्रता दिन के उत्तरार्ध की छाया के समान पहले हल्की और बाद में इतनी सघन होती जाती है कि धूप का कहीं नाम भी नहीं रहता।

मित्रता व्यक्तियों में ही नहीं दो राष्ट्रों के बीच भी होती है, पर राजनीति के क्षेत्र में मित्रता जैसी कोई बात होती ही नहीं क्योंकि डॉ. जानसन के अनुसार – ‘Politics is the last resort of scoundrels‘ अर्थात् राजनीति मक्कारों, धूर्तों, चालबाजों का अखाड़ा है। राजनीति में न कोई स्थाई मित्र होता है और न कोई स्थायी शत्रु। द्वितीय महायुद्ध के आरम्भ में रूस तटस्थ था परन्तु लेनिनग्राड पर जर्मन सेनाओं के आक्रमण के बाद वह इंग्लैण्डअमेरिका का मित्र बन गया। आज भी राष्ट्रों को पाला बदलते देर नहीं लगती। पैलेस्टाइन की समस्या पर भारत कभी इजरायिल के पक्ष में बोलता है तो कभी मुसलमान अरब देशों की हिमायत करता है। देश और राष्ट्रों की बात, राजनीती-कूटनीति की बात छोड़ कर व्यक्तियों की मित्रता की बात करें तो यही निष्कर्ष निकलता है कि मित्र बनाने से पूर्व विवेक से काम लो और मित्र वही है जो माता-पिता की तरह हित – तन, मन, धन से मित्र की सहायता करो। सच्चा मित्र के लिए सहज समर्पण-भाव से निःस्वार्थ होकर अपना सबकुछ आपके लिए लुटाने को तैयार हो। ऐसा मित्र पाना है तो दुर्लभ पर जिसे मिल जाता है उसका जीवन सफल और सार्थक हो जाता है।

 

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