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Corruption

भ्रष्टाचार के बढ़ते कदम – भ्रष्टाचार तेरे रूप अनेक पर निबंध

भ्रष्टाचार का अर्थ है भ्रष्ट आचरण अर्थात् ऐसा आचार-व्यवहार, ऐसे कार्य जो नीति-विरुद्ध हों, जो दूसरों को कष्ट देते हों। दूसरों को पीड़ा पहुँचना सबसे बड़ा पाप है, तुलसीदास कह गये हैं, ‘पर पीड़ा सम नहिं अधमाई।’ परन्तु आज कलियुग है, पाप-पुण्य के सम्बन्ध में सोचने और पाप-पुण्य की समीक्षा करने अर्थात् पाप क्या है – ‘भ्रष्टाचार की लूट है लूटी जाय तो लूट‘। प्रत्येक कार्य में सफलता पाने का, श्री-समृद्धि, ऐश्वर्य और सत्ता पाने का एक ही उपाय है – भ्रष्टाचार। अतः आज के जीवन में सर्वत्र भ्रष्टाचार व्याप्त है। राजनितिक, आर्थिक, सामाजिक-सांस्कृतिक क्षेत्रों में धर्म, शिक्षा, न्यायालयों तक में भ्रष्टाचार अपने पैर प्रसार चुका है।

भ्रष्टाचार के बढ़ते कदम – भ्रष्टाचार तेरे रूप अनेक

भ्रष्टाचार से सर्वाधिक पभावित क्षेत्र हैं सार्जनिक प्रतिष्ठान, सरकारी-अर्ध सरकारी कार्यालय। इनमें हो रहे भ्रष्टाचरण के कारण ही सामान्य जनता सबसे अधिक परेशान और दु:खी है। यहाँ भ्रष्टाचार का अर्थ है रिश्वत, घूस दिये, बिना मुट्ठी गर्म किये दफ्तरों में फाइल एक मेज से दूसरी मेज तक सरक नहीं सकती; बिना रिश्वत का पेपरवेट रखे फाइल के कागज उड़ जाते हैं। यदि फाइल सरक कर अधिकारी के पास पहुँच भी जाती है तो अधिकारी महोदय को जब तक पान-फूल अर्पित नहीं किया जाता फाइल पर उसके हस्ताक्षर नहीं होते। ‘भोलाराम का जीव’ कहानी के भोलाराम का जीव मरने के बाद भी उसकी पेंशन की फाइल में घुसा बैठा रहता है और अन्तिम निर्णय की प्रतीक्षा करता है। बिना रिश्वत दिए न टैण्डर पास होता है, न ठेका मिलता है और न काम पूरा होने पर पूरा होने का प्रमाणपत्र।

दूसरी ओर कुओं, नलकूपों, सड़कों, पुलों, बहुमंजिली भवनों के निर्माण के लिए स्वीकृत धनराशि का अधिकांश भाग इंजीनियरों, ओवरसियरों तथा लोकसेवा विभाग के कर्मचारियों की जेब में जाता है और ये सब या तो कागज पर बने रह जाते हैं और बनते ही नहीं या फिर बनने के दो-एक वर्ष बाद ही ढह जाते हैं।

रिश्वत के लोभ में सामान्य जन जन-सुलभ सेवाओं से वंचित किये जाते हैं। पाइप-लाइन बिछी है, पर पानी की बूँद नहीं टपकती, बिजली का कनैक्शन लग गया है, पर घर अंधकार में डूबा रहता है। स्वास्थ्य और फूड-इन्सपैक्टरों के रहते हुए भी आपको शुद्ध खाद्यान्न, शुद्ध पेय जल नहीं मिल पाता; ‘यहाँ गाय का दूध बिकता है’ का साइनबोर्ड लगाने वाला हलवाई गाय के दूध की बजाय बकरी, भेड़, ऊँट का दूध बेचता है, जीरे के स्थान पर पपीते के बीज बेचे जाते हैं। हर चीज में मिलावट है जो कुपोषण, रोगों को जन्म देती है। पुलिस-कार्यालय में बिना घूस दिये प्राथमिक रिपोर्ट (FIR) नहीं लिखी जाती, अपराधी रिश्वत देकर छूट जाता है और उसके स्थान पर शिकायत करने वाले को ही हवालात की सैर कराई जाती है, उसके साथ मार-पीट की जाती है। राजनेता चुनाव जितने के लिए भ्रष्टाचार की सहायता लेते हैं, धन और बाहुबल के सहारे चुनाव जीतते हैं और चुनाव जितने के बाद, सत्ता की कुर्सी पर बैठने के बाद रिश्वत के धन से रातों-रात करोड़पति बन जाते हैं। बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव ने चारा काण्ड में अपार धन एकत्र किया। आज उत्तर प्रदेश की हाल ही में अपदस्थ मुख्यमंत्री कुमारी मायावती पर CBI ने आय से अधिक करोड़ों रूपये की सम्पत्ति अर्जित करने का आरोप लगाया है। दल-बदल कर वर्तमान सरकार को अस्थिर बनाना, मंत्रिपद के लिए अपने दल और दल के नेता के साथ विश्वासघात करना आम बात हो गई है।

आर्थिक क्षेत्र में कालाबाजारी, तस्करी, जमाखोरी का राज्य है और इनके कारण अमीर पहले से अधिक अमीर होते जा रहे है और सामान्य जनता को अपार कष्ट झेलना पड़ता है। बाजार में चींजे गायब हो जाती हैं या दुकान के पीछे बहुत महँगे दामों पर मिलती हैं। बंगाल के अकाल के समय जो हुआ, वह आज भी साठ साल बाद भी भारत के उस हर कोने में होता है जहाँ सूखा, भूकम्प, बाढ़ आदि के कारण अकाल पड़ता है। भ्रष्टाचार रूपी दैत्य ने अपनी काली छाया धर्म, साहित्य-संस्कृति, न्यायालयों, शिक्षा तक के क्षेत्रों पर डाली है। धर्माचार्य, मन्दिरों के पुजारी, पंडे ढोंग, पाखण्ड में लिप्त हैं, भोली और धर्मभीरु जनता की आँखों में धूल झोंकते हैं, दान-दक्षिणा के रूप में धन पाकर भोगविलास में लिप्त रहते हैं। आन्ध्र प्रदेश के ‘तिरुपति’ मन्दिर में प्रतिवर्ष करोड़ों रूपये गुप्त दान के रूप में आते हैं। कटे हुए बालों की बिक्री से ही अपार धन प्राप्त होता है और इसका हिसाब-किताब कहीं नहीं रखा जाता। मन्दिरों में देवदासी प्रथा भ्रष्टाचार का एक अन्य रूप है। देवता की सेवा करनेवाली युवतियों को पुजारी अपनी वासना की पूर्ति का साधन बनाते हैं।

शिक्षा-संस्थानों विशेषतः डाक्टरी, इंजीनियर, प्रोद्योगिकी का प्रशिक्षण देनेवाले संस्थानों में प्रवेश पाने के लिए छात्रों को घूस देनी पड़ती है। न्यायालयों की हालत यह है कि रिश्वत का मुकदमा जिस न्यायाधीश के सामने है और जो अभियुक्त के विरुद्ध निर्णय सुनाने जा रहा है वह अपनी बगल में बैठे पेशकर को रिश्वत लेते देखता है और आँखें मूँद लेता है क्योंकि उसके पेशकार को पता है कि न्यायाधीश महोदय स्वयं हजारों-लाखों रूपये हजम कर जाते हैं और डकार भी नहीं लेते।

इस प्रकार भारत में भ्रष्टाचार सर्वत्र फैला हुआ है और कम होने की बजाय दिन-दिन बढ़ता जा रहा है। कारण हैं – पाप का भय नहीं है, लोभ-लालच बढ़ रहा है, सुखमय जीवन की लालसा सबको आक्रान्त किये है, कर्तव्य और दायित्व के प्रति सब उदासीन हो रहे हैं। इन कारणों को मिटाकर राष्ट्रीय चरित्र पर अधिक ध्यान देने से और अपना चारित्रिक उत्थान कर ही भारतवासी इस दैत्य से अपना पिंड छुड़ा सकते हैं।

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