Thursday , July 19 2018
Home / Essays / Essays in Hindi / वैशाखी त्यौहार पर विद्यार्थियों और बच्चों के लिए हिंदी निबंध
वैशाखी त्यौहार पर विद्यार्थियों और बच्चों के लिए हिंदी निबंध

वैशाखी त्यौहार पर विद्यार्थियों और बच्चों के लिए हिंदी निबंध

वैशाखी का पर्व सम्पूर्ण भारत में न मनाया जाकर केवल उत्तर भारत के पंजाब – हरियाणा प्रदेशों में मनाया जानेवाला त्यौहार है। इस त्यौहार का संबंध किसी धार्मिक या सांस्कृतिक परम्परा से नहीं है। यह शुद्ध रूप से रबी की फसल से सम्बन्ध रखने वाला मौसमी और फसली त्यौहार है। उत्तर भारत में रबी की फसल में गेहूँ, जौ, चना, मटर आदि खाद्यानन बोये जाते हैं। उत्तर भारत में लोगों का भोजन गेहूँ के आटे से बनी रोटियाँ ही हैं। अतः गेहूँ और उसकी फसल का यहाँ सर्वोपरी महत्त्व है। गेहूँ की पैदावार यद्यपि उत्तर-प्रदेश, मध्य प्रदेश में भी होती है परंतु भारत के खाद्यान्न भंडारों को सबसे अधिक मात्रा में गेहूँ देनेवाले दो ही राज्य हैं पंजाब और हरियाणा। कभी यह त्यौहार पेशावर से लेकर दिल्ली तक के सम्पूर्ण भू-खंड  में मनाया जाता था, परन्तु 1947 में देश के विभाजन के बाद अब भारत में यह त्यौहार केवल पंजाब या हरियाणा में मनाया जाता है। यह त्यौहार जैसा कि नाम से स्पष्ट है वैशाख मास की प्रतिपदा को मनाया जाता है। इस तिथि तक आते-आते खेतों में गेहूँ की फसल पककर तैयार होने लगती है। गेहूँ की दानों से भरी सुनहरी बालियाँ खेतों में हवा के झोंकों के साथ नृत्य करती दिखाई देती हैं। इनको झूमता देखकर किसानों का हृदय-मयूर भी नाचने लगता है। खेत में पकी फसल किसान के लिए लक्ष्मी का वरदान है। वह सोचता है कि बस अब कुछ ही दिन में फसल काटकर वह अपने खलिहानों को अनाज से भर देगा और फिर बाजार की मंडी में जाकर इतना धन प्राप्त करेगा कि शेष सारा वर्ष खुशी में बीतेगा, अपने बेटे – बेटियों के विवाह में वह जी खोलकर खर्च करेगा, अन्य  त्यौहारों को भी हर्षोल्लास के साथ मनायेगा। एक ओर खेतों में सुनहरे गहुओं की बालें झूमती हैं, दूसरी और किसानों का मन -मयूर नाचने लगता है। वह अपनी खुशी छिपाये नहीं छिपा पाता, उसके कंठ से गीत  फूटने लगते हैं। उसके मन का हर्षोल्लास, सुनहरी आशाएँ, गुनगुनाना, नाचना ही सामूहिक कृत्य बनकर त्यौहार का रूप धारण कर ल्रता है।

भारत के अधिकांश व्यक्ति विशेषतः देहातों में रहनेवाले ग्रामीण धार्मिक वृत्ति, ईश्वर तथा देवी-देवताओं  में आस्था रखनेवाले भोले-भाले नागरिक होते हैं। वह अच्छी फसल को दैवी अनुग्रह मानते हैं और देवता के प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट करने के लिए धार्मिक विधि – विधानों का आश्रय लेते हैं। अतः वैशाखी के दिन प्रातः काल  सूर्योदय से पूर्व ही शय्या छोड़कर स्नान के बाद मंदिरों,गुरुद्वारों या पूजा-स्थलों में जाकर अच्छी फसल के लिए ईश्वर को धन्यवाद देने के लिए भजन-पूजन, अरदास, गुरुग्रंथ साहब का पाठ सुनते हैं। खुशी मनाने का एक ढंग है पाकशाला में स्वादिष्ट व्यंजन बनाकर उनको स्वयं खाना तथा गरीबों, असहायों को खिलाना। अतः वैसाखी के दिन भी पकवान, मिष्ठान्न, खीर, हलुवा आदि बनाये जाते हैं। गृहस्थी लोग स्वयं खाते हैं और गरीबों, भिखारियों आदि को खिलाते हैं; यथाशक्ति दान-दक्षिणा भी देते हैं।

कुछ लोग वैशाख मास की संक्रान्ति से नया वर्ष शुरू होना मानते हैं, नए वर्ष या संवत्सर का आरम्भ मानते हैं और इस दृष्टि से भी इस त्यौहार का महत्त्व बढ़ जाता है। प्रातःकाल के धार्मिक कृत्यों और दोपहर के भोजन, दान – दक्षिणा के बाद शेष समय मौज-मस्त, नृत्य-गान, मेले – ठेलों में बीतता है।

दिन में सरोवर, नदी – तट या खुले मैदान मेले का रुप धारण क्र लेता है। तमाशा दिखानेवाले, सर्कसवाले वैशाखी के दिन से तीन – चार दिन पहले ही मेले में अपना ताम-झाम लेकर पहुँच जाते हैं और खेल – तमाशे दिखाने की त्यारियाँ शुरू कर देते हैं और जब वैशाखी के दिन मेले में लोगों की – युवक-युवतियों, बच्चों – बूढों की भीड़ उमड़ती है तो मेले में दूकान लगानेवालों, खेल-तमाशे दिखानेवालों की बन आती है, वे खूब पैसा कमाते हैं क्योंकि उस समय इन गाँववालों की जेबों में पैसों की कमी नहीं होती, हृदय आशा और उमंग से भरे होते हैं। संध्या से लेकर आधी रात तक खेतों, खलिहानों, गली-मुहल्लों, चौपालों पर लोग नाचते-गाते हैं। नाचनेवालों में स्त्रियाँ कम और परुष अधिक होते हैं। उनका प्रिय नृत्य है भाँगड़ा। सिक्ख अपने सिरों पर तुर्रेदार साफा पहने रंग-बिरंगे कपड़े धारण किये हाथ मटकाते, पैर थिरकाते, तरह-तरह के गीत गाते ढोल, ढोलक, नगाड़ों की धुन पर नाचते हैं। उनका हर्षोल्लास पागलपन की सीमा तक पहुँच  जाते हैं। बैलगाड़ियों और ट्रैक्टरों की ट्रालियों में बैठकर आसपास के लोग मेले में एकत्र होते हैं और तरह-तरह से अपना मनोरंजन करते हैं। अखाड़ों में दंगल-कुश्ती, कबड्डी आदि की प्रतियोगिताएँ होती हैं और विजेताओं को पुरस्कार दिये जाते हैं। सुबह से देर रात तक ढोल आदि बाजों की आवाज से वातावरण गूँजता रहता है।

सारांश यह कि वैशाखी कोई धार्मिक, सांस्कृतिक पर्व न होकर फसल पक जाने की खुशी में मनाये जानेवाला हर्षोल्लास, उत्साह, उमंग, जिन्दादिली का त्यौहार है। इसका संदेश है खूब परिश्रम करो और फिर परिश्रम का मीठा फल चखो।

Check Also

Reaching the Age of Adolescence

भारत की बढ़ती जनसंख्या / बढ़ती आबादी: देश की बर्बादी

विश्व का इतिहास जनसंख्या वृद्धि का इतिहास है। प्रो. सांडर्स का मत है कि विश्व ...

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *