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CBSE ने सिलेबस बदले, NCERT से किताबें नहीं मिली, PDF से पढ़ाई

CBSE ने सिलेबस बदले, NCERT से किताबें नहीं मिली, PDF से पढ़ाई

सिलेबस बदले, किताबें नहीं मिली, PDF से पढ़ाई: बच्चों का दुख- दर्द कब समझेगा NCERT, टीचर-अभिभावक भी कर रहे त्राहिमाम

NCERT का सिलेबस बदल गया है, 2025 में क्लास 4 से क्लास 8 तक की किताबें बदली थी, इस बार क्लास 9 की बदली है। करीब दो महीने बीत चुके हैं, अभी तक किताब उपलब्ध नहीं हो पाई है। हालाँकि दिल्ली-एनसीआर के कुछ स्कूलों में स्टूडेंट्स को मिली है, लेकिन सोशल साइंस की किताब उनके पास भी नहीं है। आखिर पीडीएफ फाइल्स से कैसे पढ़ेंगे बच्चे। गर्मी की छुट्टियों में बच्चों तक किताबें पहुँच नहीं पाएँगी। इसके बाद तो परीक्षा भी होगी। स्टूडेंट-टीचर-पेरेंट्स सभी परेशान। आखिर एनसीआरटी की रणनीति क्यों हर बार फुस्स हो जाती है।

NCERT के किताब का झोल बच्चों पर भारी पड़ रहा है। किताबों का ठिकाना नहीं और नया सेशन शुरू हुए करीब दो महीने बीत गए हैं। इतना ही नहीं, गर्मी की छुट्टियाँ भी जारी हैं, लेकिन अब तक खासकर क्लास 9 के छात्र-छात्राओं की मुश्किलें कम होती नहीं दिख रही हैं।

किताबें पीडीएफ फाइल के रूप में डिजिटल फॉर्म में मौजूद है। सिलेबस में बड़े बदलाव किए गए हैं, ऐसे में पढ़ाई जो अप्रैल में शुरू हो जानी चाहिए थी, वो अब तक नहीं हो पाई है। यहाँ तक की स्कूलों के बुक शॉप से ये भी नहीं पता चल पा रहा है कि किताबें अब तक मिलेंगी। केन्द्रीय विद्यालय और दूसरे सरकारी स्कूलों का तो और भी बुरा हाल है। बच्चे परेशान, टीचर परेशान और पैरेंट्स बिचारे सारी बातें जानकर पूरे सिस्टम को कोस रहे हैं।

पैरेंट्स जानना चाहते हैं कि आखिर सिलेबस बदले, तो किताबें पहले क्यों नहीं छपी। अगर किताबों की छपाई न कर पाए तो इस साल नया सिलेबस लागू करने की जरूरत क्या थी। तीन भाषा की जानकारी देने वाला फॉर्मूला क्लास 9 में क्यों इस तरह से थोपा गया। बच्चे पहले से परेशान हैं, वो पूरी चीजों को कैसे मैनेज करेंगे।

किताबों की अनिश्चितता को लेकर टीचर चिंतित

आंध्र प्रदेश के विशाखापत्तनम के एक बड़े स्कूल में साइंस टीचर मिस शिवानी ( बदला हुआ नाम) ने बदले हुए क्लास 9 सिलेबस में बदलाव के बाद टेक्स्टबुक्स की देरी से चिंता जताई। उनका कहना है कि स्कूलों को इस बारे में साफ जानकारी नहीं मिली है कि किताबें कब तक मिल पाएँगी।

टीचर के मुताबिक, “बदकिस्मती से यह बार-बार होने वाली दिक्कत बन गई है। एकेडमिक सेशन अप्रैल में शुरू होता है, फिर भी टेक्स्टबुक्स अक्सर कई महीनों तक अवेलेबल नहीं रहतीं। थ्री-लैंग्वेज फॉर्मूला लागू होने के साथ क्लास 9 के स्टूडेंट्स से अब तीसरी भाषा पढ़ने की उम्मीद की जाती है, लेकिन इन कोर्स के लिए जरूरी टेक्स्टबुक्स भी मौजूद नहीं हैं।”

उन्होंने कहा कि एक टीचर और CBSE स्टूडेंट के पेरेंट्स के तौर पर पूरी परिस्थिति चिंताजनक है। इस तरह की देरी स्कूलों, टीचरों, स्टूडेंट्स और पेरेंट्स, सभी के लिए अनिश्चितता वाली है। सबसे अहम बात यह है कि इससे पूरे सिस्टम की लापरवाही, निरंतरता और तैयारी की कमी का पता चलता है। एजुकेशनल रिफॉर्म्स और करिकुलम में बदलावों को समय पर प्लानिंग, सही रिसोर्स और लागू करने के लिए सही रणनीति की जरूरत होती है, ताकि बच्चों की पढ़ाई-लिखाई पर बुरा असर न पड़े।

दिल्ली-एनसीआर की एक केन्द्रीय विद्यालय में टीचर सीमा (बदला हुआ नाम) सोशल साइंस पढ़ाती हैं। इनका कहना है कि क्लास 9 के सोशल साइंस में काफी बदलाव आए हैं। छात्रों को पीडीएफ से पढ़ाना पड़ता है। क्लास में बच्चों के पास किताब नहीं है, इसलिए उन्हें समझाना अपने आप में बड़ा चैलेंज है। बच्चों को पीडीएफ फाइल की कॉपी निकालने के लिए कहा, ताकि उन्हें जो बताया जा रहा है, वह समझ सकें। इस बीच गर्मी की छुट्टियाँ शुरू हो गई है, किताबों का कोई अता-पता नहीं है। बच्चों की परीक्षा भी शुरू हो जाएगी, आखिर शिक्षक क्या करे?

एडवांस मैथ्स के बाद एडवांस साइंस की एंट्री

क्लास 9 में इस साल से एडवांस मैथ्स के साथ एडवांस साइंस भी शुरू हो गया है। 2024 में सीबीएसई के स्कूलों में एडवांस मैथ्स की शुरुआत हुई थी। आज तक इसके लिए एनसीईआरटी ने कोई किताब नहीं छापा है। अगर छापा भी होगा तो बच्चों के हाथों तक नहीं पहुँचा। ऐसे में टीचर जो किताब मौजूद है, उससे ही मैथ्स करवाते हैं। जो थोड़ा टफ होता है, उसे एडवांस मैथ्स का सवाल बता दिया जाता है और जो आसान होते हैं उसे बेसिक मैथ्स का। अब सोचा जा सकता है कि एक ही क्लासरूम में जो बच्चा एडवांस मैथ्स वाला सवाल कर रहा होगा, उस वक्त बेसिक मैथ्स लिया बच्चा क्या कर रहा होगा।

ऐसी स्थिति में अब एडवांस साइंस की पढ़ाई शुरू हो रही है। आगे जो बच्चे साइंस पढ़ना चाहते हैं, उन्हें एडवांस मैथ्स और एडवांस साइंस लेना है। ह्यूमेनिटी और कॉमर्स लेने वाले बच्चों को अभी से साइंस पर ज्यादा मेहनत नहीं करना है। आखिर क्लास 11 में ये अंतर आ ही जाता है, तो क्लास 9 में इसकी जरूरत क्या थी।

किताब जिसे मिले, वे छात्र भी परेशान

डीपीएस नोएडा में पढ़ने वाली क्लास 9 की छात्रा अक्षरा का कहना है कि उन्हें दो-तीन दिन पहले किताब मिल गई है। लेकिन अभी भी सोशल साइंस की किताब नहीं मिली है। वैसे भी मैथ्स की तो अलग किताब स्कूल पहले से ही पढ़ाता रहा है। साइंस के लिए एनसीईआरटी की किताब मिल गई है। उसका कहना है कि साइंस की किताब पूरी तरह बदल गई है। मैथ्स का पहला चैप्टर पहले नंबर सिस्टम हुआ करता था, लेकिन अब ज्योमेट्री का है। पहले बच्चे के लिए कैलकुलेशन वाले सवाल ज्यादा आते थे, लेकिन अब लैंग्वेज बेस सवाल ज्यादा हैं। गणित में भी ऐसा लगता है कि लैंग्वेज समझना पड़ेगा। काफी मुश्किल लग रहा है इसे समझना।

उसने कहा कि साइंस की किताब भी काफी मुश्किल लग रही है। बहुत ज्यादा गहराई से समझना पड़ेगा। इसे वही छात्र खुद से कर पाएगा, जिसे साइंस पढ़ना काफी पसंद हो। समरबिल स्कूल, दिल्ली में पढ़ने वाली छात्रा रियाना का कहना है कि उसे तो अभी तक किताब भी नहीं मिली है। स्कूल के अंदर जो बुक शॉप हैं, वहाँ पूछने पर बोला जाता है कि अभी तक उन्हें कोई जानकारी नहीं है कि किताब कब तक मिलेगा। टीचर ने बच्चों को पीडीएफ भेज कर उसकी कॉपी करवा कर लाने के लिए कहा था। अप्रैल में जैसे-तैसे उनलोगों ने पढ़ा है। मैम भी परेशान रहती हैं। बच्चे भी किताब नहीं मिलने से परेशान हैं। उनकी तो टर्म 1 की परीक्षा भी हो गई है, लेकिन किताब का ठिकाना नहीं है।

जब स्कूल में मौजूद किताब के दुकानदार से बात करने की कोशिश की, तो उसने कहा कि अभी तक तो किताबें नहीं आई हैं। कब तक आएगी उन्हें भी नहीं पता। अब तो गर्मी की छुट्टियाँ चल रही है। अब बच्चों को जुलाई में स्कूल खुलने के बाद ही पता चलेगा कि किताब मिल पाएगी या नहीं। हालाँकि स्कूल से अलग कोंडली के ‘उत्तराखंड बुक शॉप’ के दुकानदार का कहना है कि उनके यहाँ सारी किताबें मिल रही हैं, सिर्फ क्लास 9 की सोशल साइंस की किताब अब तक नहीं आई है। उन्होंने जानकारी दी कि जल्द ही एडवांस मैथ्स के साथ-साथ एडवांस साइंस की किताब बाजार में आने वाली है।

तीन लैंग्वेज पढ़ने की अनिवार्यता से सभी परेशान

बच्चे जब किताब नहीं मिलने से परेशान हैं, वहीं इस साल तीन लैंग्वेज पढ़ना भी क्लास 9 में अनिवार्य कर दिया गया है। एक मातृभाषा, क्षेत्रीय भाषा और एक विदेशी भाषा। ज्यादातर स्कूलों में इसके लिए हिन्दी, संस्कृत और अंग्रेजी पढ़ाई जा रही है। ऐसे में जर्मन, फ्रेंच, स्पेनिश जैसी विदेशी भाषा अब नहीं पढ़ाई जा रही है। इससे जुड़े शिक्षकों को भी स्कूलों ने बाय-बाय कर दिया है।

डीएवी स्कूल गाजियाबाद में क्लास 10 में पढ़ने वाली छात्रा की माँ अल्पना राय, जो माँ के साथ-साथ बच्चों को पढ़ाती भी हैं, उनका कहना है कि बच्चों को दो-तीन दिन पहले किताबें मिली है। उन्होंने किताबों में कई कमियाँ पाई हैं। साइंस में बहुत ज्यादा सिलेबस है, उसे इस तरह से बनाया गया है कि बच्चों के लिए खुद से समझना काफी मुश्किल है। टीचर को भी पढ़ना पड़ेगा। मैथ्स का भी वही हाल है। सोशल साइंस की किताब मिली नहीं है। अप्रैल से अब तक बच्चों के पास किताबें नहीं थी, सिलेबस बदल दिया गया और किताब भी न मिले, तो बच्चा क्या करे। क्लास 9 बच्चे का आधार होता है। इस क्लास में लापरवाही काफी गंभीर बात है। ऐसी स्थिति में तीन लैंग्वेज की अनिवार्यता बच्चों पर भारी पड़ रही है।

समरविल स्कूल नोएडा में पढ़ने वाली एक छात्रा की माँ जैस्मिन तिर्की का कहना है कि उन्होंने तीन लैंग्वेज की अनिवार्यता के खिलाफ स्कूल प्रबंधन से विरोध जताया है। उनका कहना है कि उन्होंने अप्रैल में स्कूल से पुरानी किताबें खरीद ली थी। तभी वही किताबें बेची जा रही थी। अब सिलेबस बदल गया है, तो फिर खरीदना पड़ रहा है। ये दोहरा खर्च भी उन्हें परेशान कर रहा है।

हालाँकि, उनका कहना है कि सिलेबस को वक्त-वक्त पर परखा जाना चाहिए, इसमें कोई दिक्कत नहीं है। आज के परिवेश में बदलाव होना चाहिए। लेकिन सिलेबस में बदलाव के बाद वक्त पर किताबों का मिलना भी जरूरी है। अगर किताब नहीं मिलेंगे तो पीडीएफ फाइल से बच्चे पढ़ते हैं। मोबाइल से दूर रखने की हमारी सारी कोशिश बेकार हो जाती है, इसलिए बदलाव से पहले सही रणनीति बनाना जरूरी है। बदलाव करिए, लेकिन बच्चों की पढ़ाई की निरंतरता को तोड़ कर नहीं। अगर अगले साल इसे लागू किया जाता, तो किताबें भी मार्केट में आ जाती और बच्चों को सहूलियत भी होती।

ये हाल सिर्फ क्लास 9 के बच्चों का नहीं हुआ है। साल 2025 में क्लास 4 से क्लास 8 तक का सिलेबस बदल गया था। उस वक्त भी कई महीनों तक बच्चों को किताबें नहीं मिल पाई। क्लास 5 और क्लास 8 के बच्चों ने तो जून तक इंतजार किया था। इसके बावजूद एनसीईआरटी ने कोई सबक नहीं लिया और साल 2026 में क्लास 9 का सिलेबस बदल कर किताब उपलब्ध कराने में असफल रहे। फिर वही पीडीएफ फाइल और टीचर्स के नोट्स पर बच्चों की निर्भरता। गाँवों-कस्बों के बच्चे क्या पीडीएफ फाइल खोल पाएँगे? क्या इंटरनेट की ऐसी सुविधा उन्हें मिलती है, ये भी बड़ा सवाल है। कई बार अंग्रेजी माध्यम की पुस्तकें पहले छप जाती हैं, हिन्दी में बाद में आती है। इसको लेकर भी असमानता का आरोप एनसीईआरटी पर लगता है।

नकली किताबों से सावधान रहें

एक बात और है कि प्राइवेट स्कूल प्राइवेट पब्लिशर्स की महँगी किताबें स्कूल में पढ़ाते हैं, इसे खरीदने का दबाव अभिभावकों पर होता है। इसको लेकर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने राज्य सरकारों को नोटिस भेजा है और पूछा है कि जब एनसीईआरटी की किताबें कम पैसों में उपलब्ध है, तो स्कूल क्यों महँगी किताबों से पढ़ाती है। लेकिन, एनसीईआरटी की किताबें उपलब्धता पर भी बड़ा सवाल है।

एनसीईआरटी की किताबों में कमी की वजह से कई जगहों पर नकली किताबें मिल रही हैं। इन किताबों की भारी माँग रहती है। उसके अनुपात में आपूर्ति नहीं हो पाती। इसके कारण बाजार में नकली और पायरेटेड किताबों का बड़ा गिरोह सक्रिय है। ये किताबें घटिया कागज, हल्की स्याही और बिना लोगो के छपती हैं, जिससे बच्चों की पढ़ाई और आँखों पर बुरा असर पड़ता है।

2020 में सिर्फ मेरठ और आसपास के इलाकों में करीब 5.64 करोड़ रुपये की नकली किताबें खपाने की बात सामने आई थी। 2025 में दिल्ली के शाहदरा में नकली किताबों का एक रैकेट पकड़ा गया था जिसके पास से 1.7 लाख से अधिक नकली किताबें जब्त की गई थी, जिसकी कीमत करीब 2.4 करोड़ बताई गई थी। कहने का मतलब यह है कि एनसीईआरटी की नकली किताबों से भी सावधान रहने की जरूरत है। किताबों की कमी की वजह से ‘नकली का धँधा’ भी जोरों से चल रहा है।

NCERT की किताबों में संशोधन और विवाद

एनसीईआरटी की किताबों में हाल ही में कक्षा 8 के सोशल साइंस की किताब में ‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’ के मुद्दे पर जमकर विवाद हुआ। सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी आपत्ति जताई और गरिमा को ठेस पहुँचाने वाला बताया। इसके बाद एनसीईआरटी को माफी माँगनी पड़ी और किताब को बाजार से हटाना पड़ा।

कक्षा 8 के सोशल साइंस की किताब में राजपूत राजघरानों के मराठा साम्राज्य में दिखाए जाने पर जमकर बवाल मचा। दरअसल किताब में संस्थान ने 1759 का एक मैप प्रकाशित किया, जिसमें राजस्थान के स्वतंत्र राजघरानों जैसे- जैसलमेर, बीकानेर, बूंदी को मराठा साम्राज्य में दिखाया गया। सवाल उठने के बाद NCERT को बदलाव करना पड़ा। उसने एक कमेटी बनाई और समीक्षा के बाद संस्थान ने माना कि उससे बड़ी गलती हुई थी और इस मैप का कोई सोर्स नहीं था।

कक्षा 7वीं और 12वीं के पाठ्यक्रम से मुगल साम्राज्य और दिल्ली सल्तनत से जुड़े अध्याय हटाने पर विपक्ष ने भारी हंगामा खड़ा किया। स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े कुछ हिस्सों को हटाने को लेकर एनसीईआरटी ने खेद जताया और इसे आगामी शैक्षणिक सत्र में संशोधित कर पेश करने की बात कही।

कोरोना काल में एनसीआरटी ने क्लास 10 के पाठ्यक्रम से डार्विन का विकासवाद यानी evolution और आवर्त सारणी यानी periodic table हटा दिया था। इसको लेकर शिक्षाविदों ने जमकर लताड़ लगाई। हालाँकि एनसीईआरटी ने स्पष्ट किया कि डार्विन का विकासवाद और आवर्त सारणी को हटाया नहीं गया है, बल्कि कक्षा 11वीं और 12वीं के विज्ञान के विस्तृत पाठ्यक्रम में इन्हें शामिल रखा गया है।

शिक्षाविदों का मानना था कि यह छात्रों को विज्ञान की समझ से दूर करने वाला कदम है। इसके अलावा पर्यावरण से जुड़े चैप्टर जैसे ऊर्जा के स्रोत, प्राकृतिक संसाधनों का प्रबंधन भी हटा दिए गए। इस पर भी बवाल हुआ।

कुल मिलाकर एनसीईआरटी को किताबों में संशोधन से लेकर नई किताब बाजार में लाने के लिए सही रणनीति की जरूरत है। सालों से किताबों की कमी का सामना बच्चे कर रहे हैं। आखिर किताबें कम क्यों छापी जाती है? यह जानते हुए कि इससे कालाबाजारी होती है और नकली किताबों के ढेर में से असली को छाँटना छात्रों के लिए आसान नहीं होता। ऐसे में अगर किताब बाजार में ही उपलब्ध न हो तो बच्चे क्या करें? उनकी पढ़ाई में गैप आता है। मन नहीं करता पढ़ने का। स्कूल भी हाथ खड़े कर देते हैं। जरा सोचिए ऐसे स्टूडेंट्स का क्या हाल होगा, जो गाँव में बगैर सिलेबस और किताब के पढ़ने की कोशिश करते होंगे।

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