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9th Hindi NCERT CBSE Books

धूल NCERT 9th Class (CBSE) Hindi Sparsh Chapter 1

भाषा-अध्ययन

प्रश्न: निम्नलिखित शब्दों के उपसर्ग छाँटिए:

उदाहरण: विज्ञापित – वि (उपसर्ग) ज्ञापित
संसर्ग, उपमान, संस्कृति, दुर्लभ, निर्वंद्व, प्रवास, दुर्भाग्य, अभिजात, संचालन।

उपसर्ग शब्द
1 संसर्ग सम सर्ग
2 उपमान उप मान
3 संस्कृति सम् स्कृति
4 दुर्लभ दुर् लभ
5 निर्द्वंद निर् द्वंद्व
6 प्रवास प्र वास
7 दुर्भाग्य दुर् भाग्य
8 अभिजात अभि जात
9 संचालन सम् चालन

प्रश्न: लेखक ने इस पाठ में धूल चूमना, धूल माथे पर लगाना, धूल होना जैसे प्रयोग किए हैं। धूल से संबंधित अन्य पाँच प्रयोग और बताइए तथा उन्हें वाक्यों में प्रयोग कीजिए।

उत्तर:

  • धूलि भरे हीरे: जिन बच्चों को आप उपेक्षा की दृष्टि से देख रहे हैं वे धूलि भरे हीरे हैं।
  • धूल से खेलना: मेरा तो बचपन धूल से खेलते हुए बीता है।
  • धूल-धक्कड़ होना: यहाँ तो आप चाहकर भी धूल-धक्कड़ से नहीं बच सकते हैं।
  • धूल चाटना: दारा सिंह ने विदेशी पहलवान को धूल चाटने पर विवश कर दिया।
  • धूल का स्पर्श करना: विदेश से लौटे उद्योगपति ने जहाज़ से उतरते ही मातृभूमि की धूल का स्पर्श किया।

लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न: अभिजात वर्ग की प्रसाधन-सामग्री कब धूल हो जाती है?

उत्तर: अभिजात वर्ग की प्रसाधन-सामग्री उस समय धूल हो जाती है जब बालक कृष्ण के मुँह पर गोधूलि छा जाती है। इससे बालक कृष्ण का सौंदर्य कई गुना बढ़ जाता है।

प्रश्न: धूलि के विषय में हमारी सभ्यता की सोच क्या है?

उत्तर: धूलि के संबंध में हमारी सभ्यता की सोच यह है कि वह स्वयं धूल से संसर्ग से बचना ही नहीं चाहती बल्कि अपने बच्चों को भी धूल से दूर रखती है।

प्रश्न: भोलानाथ किन्हें कहा गया है और क्यों?

उत्तर: भोलानाथ उन भोले-भाले अबोध शिशुओं को कहा गया है जो धूल में खेलते-खेलते धूल-धूसरित हो जाते हैं। ये शिशु भस्म रमाए भोले शंकर जैसे दिखते हैं।

प्रश्न: हमारी सभ्यता भोलानाथ से क्यों बचना चाहती है?

उत्तर: हमारी सभ्यता नकली चमक-दमक, सज-धज और दिखावे में भरोसा करती है। वह सोचती है कि भोलानाथ को गोद में उठाने से उसके नकली सलमे-सितारे धुंधले पड़ जाएँगे इसलिए वह बचना चाहती है।

प्रश्न: “धन्य-धन्य वे हैं नर मैले जो करत गात कनिया लगाय धूरि ऐसे लरिकान की” से कवि की किस प्रवृत्ति का पता चलता है?

उत्तर: “धन्य-धन्य वे हैं नर मैले जो करत गात कनिया लगाए धूरि ऐसे लरिकान की” से कवि की प्रवृत्ति का पता चलता है कि कवि हीरों का प्रेमी है, धूलि भरे हीरों का नहीं।

प्रश्न: देवताओं पर किस तरह की मिट्टी चढ़ाई जाती है?

उत्तर: देवताओं पर अखाड़े की वह मिट्टी चढ़ाई जाती है जो साधारण धूल नहीं, बल्कि तेल और मट्ठे से सिझाई हुई होती है।

प्रश्न: “शरीर भी तो मिट्टी का ही बना है” – वाक्य में किस ओर संकेत किया गया है?

उत्तर: “शरीर भी तो मिट्टी का ही बना है” – वाक्य में उस ओर संकेत किया गया है कि हमारे शरीर की रचना जिन पाँच तत्वों से मिलकर हुई है, मिट्टी भी उनमें एक प्रमुख तत्व है।

प्रश्न: गोधूलि को केवल गाँवों की संपत्ति क्यों कहा गया है?

उत्तर: गोधूलि को केवल गाँवों की संपत्ति इसलिए कहा गया है क्योंकि शहरों में तो मोटर-गाड़ियों की धूल-धक्कड़ होती है, जबकि गाएँ एवं उनके पैरों से उठने वाली गोधूलि गाँवों में ही होती है।

प्रश्न: बालकृष्ण के मुँह पर छाई धूल को लेखक श्रेष्ठ क्यों मानता है?

उत्तर: बालकृष्ण के मुँह पर छाई धूल बालक के रूप सौंदर्य को और भी निखार देती है जिससे उसकी सहज पार्थिवता और भी निखर उठती है, इसलिए लेखक इस धूल को श्रेष्ठ मानता है।

प्रश्न: “मिट्टी और धूल” में क्या अंतर है? “धूल” पाठ के आधार पर स्पष्ट कीजिए।

उत्तर: “धूले और मिट्टी” दोनों ही एक सिक्के के दो पहलू हैं। दोनों का अस्तित्व एक दूसरे के बिना असंभव है। इन दोनों में शब्द और रस, “देह और प्राण” तथा चाँद और चाँदनी जितना ही अंतर है।

प्रश्न: धूल कहते ही किसका स्मरण हो आता है? “धूल” पाठ के आधार पर स्पष्ट कीजिए।

उत्तर: धूल कहते ही शरद के धुले-उजले बादलों का स्मरण हो आता है। श्वेत रंग ही धूल का सहज रंग होता है।

प्रश्न: अखाड़े की मिट्टी की क्या विशेषता है? इसके साथ किसका दुर्भाग्य जुड़ जाता है? “धूल” पाठ के आधार पर लिखिए।

उत्तर: अखाड़े की मिट्टी की विशेषता यह है कि ऐसी मिट्टी सामान्य धूल नहीं होती है। यह तेल एवं मट्ठे द्वारा सिझाई गई पवित्र मिट्टी होती है जिसे देवताओं पर चढ़ाया जाता है। युवावस्था में यह मिट्टी जिन युवाओं के शरीर पर नहीं, इसके प्रति उस युवा का दुर्भाग्य जुड़ जाता है।

प्रश्न: जीवन के लिए किन सार तत्वों को आवश्यक माना जता है? ये तत्व कहाँ से प्राप्त होते हैं?

उत्तर: जीवन के लिए जिन सार तत्वों की आवश्यकता होती है, वे हैं – हवा, पानी, मिट्टी, आकाश और आग। ये सभी तत्व मिट्टी से ही मिलते हैं।

प्रश्न: धूल, धूर, धूली, धूरि आदि की व्यंजनाएँ स्पष्ट कीजिए।

उत्तर: धूल जीवन का यथार्थ है, धूलि उसकी कविता है, धूली छायावादी दर्शन है तथा धूरि लोक संस्कृति का नवीन जागरण है।

प्रश्न: काँच और धूलि भरे हीरे के प्रति हमारी सभ्यता के व्यवहार में क्या अंतर नज़र आता है?

उत्तर: हमारी सभ्यता काँच की चमक-दमक से आकर्षित होकर काँच की झूठी चमक से प्यार करती है, जबकि धूल भरे हीरे के संसर्ग से बचना ही नहीं चाहती बल्कि उसे देखकर भी अनदेखा करती है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न: गोधूलि का गाँवों से गहरा नाता है। स्पष्ट कीजिए।

उत्तर: गोधूलि और गाँव परस्पर इस तरह से जुड़े हैं कि गाँव का नाम लेते ही गोधूलि का नाम स्वतः ही जुबान पर आ जाता है। वास्तव में गोधूलि गाँवों में ही मिलती है। सूर्यास्त के समय गाएँ अपने घर की ओर जब चारागाहों की ओर भागती हैं तो उनके खुरों से उठने वाली धूल ही गोधूलि है। इस धूल पर जब छिपते सूर्य से किरणें पड़ती हैं तो धूल पर सुनहरी चादर चढ़ जाती है। इसी समय जब गाँव की पगडंडी से बैलगाड़ी गुजरने से उठने वाली धूल से आसमान में रुई के बादलों-सी छा जाती है। चाँदनी रात में गाड़ियों के पीछे उठने वाली धूल का सौंदर्य अद्भुत होता है।

प्रश्न: “धूलि भरे हीरे” किन्हें कहा गया है? हमारी सभ्यता इन हीरों से कितना प्यार करती है? “धूल” पाठ के आधार पर लिखिए।

उत्तर: “धूलि भरे हीरे” गाँव के उन छोटे-छोटे अबोध बच्चों को कहा गया है जो धूल में खेलकर, गिरते-उठते धूल धूसरित हो जाते हैं। हमारी सभ्यता चमक-दमक चाहती है। उसका मानना है कि इन धूलि भरे हीरों को गोद में उठाते ही उसके कपड़े मैले हो जाएँगे। उसकी चमक-दमक फीकी पड़ जाएगी। यह सभ्यता काँच को चमक के कारण अपनाने को तैयार है परंतु इन धूलि भरे हीरों को नहीं। इस कारण वह इन हीरों को देखकर भी अनदेखा करती है और इनसे दूरी बनाकर रखती है।

प्रश्न: उन कारणों का उल्लेख कीजिए जिनके कारण गाँव का बचपन शहर के बचपन से भिन्न होता है? “धूल” पाठ के आधार पर लिखिए।

उत्तर: गाँव के बचपन और शहर के बचपन में अंतर होने के अनेक कारण हैं, पर इनमें अंतर का मुख्य कारण धूल है। गाँव में चारों ओर धूल होती है। इसी धूल में बचपन पल-बढ़कर बड़ा होता है। इसमें खेलने-गिरने और धूल-धूसरित होने से बच्चों का सौंदर्य बढ़ जाता है। इससे हर शिशु भोलानाथ बना नजर आता है। गाँव के अखाड़े में यही मिट्टी तेल और मट्ठे से सनकर शरीर को मजबूत बनाने के साथ-साथ असीम सुख की अनुभूति कराती है। इसके विपरीत शहर में मोटर-गाड़ियों से उठने वाली धूल-धक्कड़ होती है। यह धूल गंदगी को पर्याय मानी जाती है जिससे सभी अपने बच्चों को बचाए रखना चाहते हैं।

प्रश्न: “नीच को धूरि समान” का आशय क्या है? लेखक ने इसके विरोध में क्या कहा है?

उत्तर: “नीच को धूरि समान” का आशय है-धूरि अर्थात् धूलि के समान नीच कौन है। अर्थात् धूलि के समान नीच कोई नहीं होता। लेखक ने इसके विरोध में यह कहा है किसी के कहे गए इस कथन को वेद वाक्य अर्थात् त्रिकाल सत्य नहीं मान लेना चाहिए। धूल नीच कैसे हो सकती है क्योंकि इसी धूल में हमारे देश के बच्चों का बचपन खेल-कूदकर बड़ा होता है। इसी धूल को श्रद्धावश सती अपने सिर से और सैनिक एवं योद्धा अपनी आँखों से लगाकर इसके प्रति श्रद्धा प्रकट करता है। ऐसी धूल तो सचमुच श्रद्धा के योग्य है।

प्रश्न: किसानों के हाथ-पैर और मुख पर छाई धूल आधुनिक सभ्यता से क्या कहती है और क्यों?

उत्तर: किसान हमारे समाज का अन्नदाता है। वह मिट्टी में सनकर अनाज उपजाता है। उसके इस कार्य से हाथ-पैर और मुख पर धूल लगना स्वाभाविक है। किसान के तन पर लगी धूल हमारी आधुनिक सभ्यता से कहती है कि वह इन किसानों का सम्मान करना सीखें। वास्तव में ये किसान मात्र किसान न होकर वे सच्चे हीरे हैं जिन्हें हथौड़े की चोट भी नहीं तोड़ पाती है। जब वे उलटकर चोट करेंगे तो काँच और हीरे का भेद पता चल जाएगा।

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