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स्वामी दयानन्द सरस्वती पर निबंध Swami Dayanand Saraswati

स्वामी दयानन्द सरस्वती पर निबंध Swami Dayanand Saraswati

भारत प्राचीन काल से ही ऋषि-मुनियों का देश रहा है। भगवान ने अनेक बार स्वयं अवतार लेकर इस भूमि को पवित्र किया है। राम, कृष्ण, बुद्ध, महावीर के रूप में इस धरती का परम कल्याण किया है। अनेक महान आध्यात्मिक गुरु उच्च कोटि के संत और समाज सुधारक इस देश में हुए। नव जागरण का शंख नाद करने वाले राजा राम मोहनराय, रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानन्द की भांति ही स्वामी दयानन्द का नाम भी अग्रगण्य है।

महर्षि दयानन्द सरस्वती का जन्म गुजरात प्रान्त के टंकारा नामक ग्राम में सन् 1824 ई॰ में हुआ था। इनके पिता का नाम अम्बा शंकर था। इनका बचपन में नाम मूल शंकर था। इनकी शिक्षा घर पर ही हुई। कुशाग्र बुद्धि होने के कारण इन्हें 12 वर्ष की अल्पायु में ही संस्कृत का अच्छा ज्ञान हो गया।

स्वामी जी के पिताजी शिव भक्त थे। शिवरात्रि का महान् पर्व आया। पिता के आग्रह पर उन्होंने व्रत भी रखा और मन्दिर भी गए। रात को शिव दर्शन की लालसा में जाग रहे थे तभी उन्होंने देखा कि एक चूहा आया और शिवलिंग पर चढ़कर मिठाई खाने लगा। तभी उनके मन में विचार आया कि शिव संसार के जन्मदाता, पालन करता और संहारक हैं। क्या वे अपने भोग की मिठाई की रक्षा कर पाने में समर्थ नहीं हैं ? तभी उन्होने अपने पिता को उठाया और अपनी शंका का निवारण करना चाहा, लेकिन पिता उसका उत्तर दे पाने में समर्थ नहीं हुए। उसी दिन से वे शिव को ढूंढ़ने में लग गए।

बहन और चाची की मृत्यु से इनमें विरक्ति भाव जागृत हो गया। सच्चे प्रभु की प्राप्ति और मृत्यु पर विजय पाने की इच्छा लिए स्वामी विरजानन्द को अपना गुरु बनाया। शिक्षा प्राप्ति के पश्चात् गुरु दक्षिणा में उनसे यही माँगा गया कि वे अपना समस्त जीवन वेदों के प्रचार में लगा दें।

गुरु की आज्ञानुसार वे धर्म के प्रचार-प्रसार में निकल पड़े। साधु, ब्राह्मणों, विद्वानों से शास्त्रार्थ किया। साधारण जनता को वेदों का उपदेश दिया। मूर्तिपूजा का विरोध और ‘ईश्वर का एक रूप है’ का प्रचार किया। सहस्त्रों हिन्दुओं को मुसलमान और ईसाई होने से बचाया। स्त्री शिक्षा का प्रचार किया। उन्होंने बाल विवाह का विरोध किया। सती प्रथा का खण्डन और विधवाओं के पुन: विवाह के पक्ष में थे। जाति-पाति का कड़ा विरोध किया। अछूतों के उद्धार के लिए अनाथालय और विधवाश्रम खोले।वैदिक शिक्षा के प्रसार के लिए गुरुकुल बनाए। जिनमें गुरुकुल कांगड़ी (हरिद्वार) अधिक विख्यात है और वर्तमान समय में यह विश्वविद्यालय का रूप धारण कर चुका है।

अपनी विचारधारा का प्रचार-प्रसार करने के कारण अनेक लोग इनके शत्रु हो गए और उन्होंने इन्हें मारने के अनेक षड्‌यंत्र रचे लेकिन वे असफल रहे। एक राजा को एक वेश्या के साथ बैठा देखकर उन्होंने राजा को कटु वचन कहे। इससे वेश्या चिढ़ गई और उसने एक विश्वास पात्र रसोइए को धन देकर दूध में पारा मिलवा दिया। अनेक उपचार कराने पर भी वह विष मुक्त न हो सके। 30 अक्टूबर सन् 1883 ई॰ को 59 वर्ष की अवस्था में इनकी मृत्यु हो गई।

स्वामी जी ने धर्म प्रचारार्थ अनेक पुस्तकें लिखी- संस्कार विधि, सत्यार्थप्रकाश, आर्याभिविनय आदि। अहिन्दीभाषी होने पर भी हिन्दी और वेदों का प्रचार किया। रुढ़िवाद और कुरीतियों कै अन्धकार में डूबी हुई जनता को ज्ञान को प्रकाश दिया।

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