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Democracy

जनतंत्र में नागरिकों के अधिकार तथा कर्त्तव्य पर विद्यार्थियों के लिए निबंध

प्रजातंत्र या जनतंत्र की सर्वाधिक प्रचलित और भू उद्धृत परिभाषा है – जनता की, जनता द्वारा जनता के लिए शासन-प्रणाली। इस परिभाषा में जहाँ ‘जनता द्वारा’ शब्द देश के नागरिकों के कर्त्तव्य की ओर संकेत करते हैं वहाँ ‘जनता के लिए’ जनता के अधिकारों पर बल देते हैं। वस्तुतः जनतंत्र रूपी रथ के ये दो पहिए हैं। जैसे रथ की सुचारू गति के लिए दोनों पहियों में सन्तुलन बना रहना आवश्यक हैं, एक ही पहिये के खराब होने पर रथ का सन्तुलन बिगड़ जाता है, वह आगे नहीं बढ़ सकता, उसी प्रकार प्रजातंत्र के सुचारू, व्यवस्थिति ढंग से चलने के लिए आवश्यक है कि देश के नागरिक पहले अपने कर्त्तव्यों को पहचानें, उनका पालन करें और फिर अपने अधिकारों की माँग करें। कर्त्तव्य पालन और अधिकारों माँग के बीच सन्तुलन न हो पाने पर कोई भी जनतांत्रिक शासन-व्यवस्था गड़बड़ा जाती है। कर्त्तव्यों को पालन न करने पर अधिकार मिलना कठिन है। स्वतंत्रता और स्वच्छन्दता में अन्तर है। स्वच्छन्दता का अर्थ है मनमना कार्य करने की छूट, भले ही उससे दूसरों को हानि पहुँचे, अराजकता और अनुशासनहीनता फैले। सड़क पर चलने का हमारा अधिकार है, पर साथ ही यह कर्त्तव्य भी है कि हम राजमार्ग कार्यालय द्वारा सड़क पर चलने, सड़क पार करने, वाहन चलाने सम्बन्धी नियमों का पालन करें, दिशा-निर्देशों का ध्यान रखें।

मनुष्य स्वभाव से सुविधा-भोगी है, कम असुविधा उठाना चाहता है। रेगिस्तान, कांटों भरे मार्ग पर न चलकर हरे-भरे मैदानों में, छायादार वृक्षों वाली सड़क पर चलना चाहता है। उसकी यही मनोवृत्ति और मानसिकता उसके दैनिक कार्यकलाप में प्रतिबिम्बित होती है। वह अधिकार पाने और उनका लाभ उठाने के लिए लालायित रहता है और जब कर्त्तव्य-पालन का समय आता है तो उनके प्रति निरपेक्ष, उदासीन, लापरवाह हो जाता है। जनतंत्र की असफलता का मुख्य कारण ही अधिकारों और कर्त्तव्यों के बीच असन्तुलन है।

जनतंत्र में कर्त्तव्य-पालन की बात पहले आती है, अधिकारों की बात बाद में। ‘First deserve and then desire‘ उक्ति भी इसी बात की ओर संकेत करती है। कर्त्तव्यपालन करनेवाला ही अधिकार पाने का हकदार या पात्र होता है।

हम पहले नागरिकों के कर्त्तव्यों की चर्चा करते हैं। ये कर्त्तव्य हैं –

  1. जनता द्वारा चुने गये शासनतंत्र के प्रति पूरी सच्चाई, ईमानदारी तथा निष्टा के साथ सहयोग करना, उसके द्वारा बनाये गये नियमों, कानूनों, विधि-विधानों का पालन करना।
  2. अपने प्रत्येक कार्य में अनुशासित रहना, संयम, विवेक एवं सामूहिक जन-हित का ध्यान रखना।
  3. देश में सुरक्षा, शान्ति बनाये रखना और शान्ति तथा सुरक्षा भंग करनेवालों की जानकारी मिलते ही उसकी सुचना अधिकारियों को देना।
  4. असामाजिक, अनैतिक कार्य करनेवालों – तस्करों, कालाबाजार करनेवालों, जमाखोरों, रिश्वत लेनेवालों, माफिया दलों से सावधान रहना तथा उनका भंडाफोड़ करना।
  5. धार्मिक, सांप्रदायिक विद्वेष फैलानेवाले असमाजिक तत्वों से सावधान रहना, उनके दुष्प्रचार को रोकना, आवश्यक होने पर उनकी शिकायत कर उन्हें दंड दिलवाना।
  6. शासनतंत्र, सरकारी कर्मचारियों, शिक्षा, स्वास्थ्य, सफाई विभागों में कार्य करनेवाले अधिकारीयों एवं उनके अधीन काम करनेवालों की लापरवाही, अकर्मण्यता और दीर्घसूत्रीपन की शिकायत करना।
  7. अपने आसपास के पर्यावरण को स्वच्छ रखना।
  8. प्रौढ़ शिक्षा, विकलांगों की शिक्षा के कार्यक्रमों में यथाशक्ति भाग लेकर साक्षरता-अभियान में सहयोग देना।

इन कर्त्तव्यों को पालन करनेवाले नागरिकों को जनतंत्र में अधिकार स्वतः ही प्राप्त ही जाते हैं। उसके मौलिक या बुनियादी अधिकार हैं –

  1. रोटी, कपड़ा, आवास की सुविधाएँ पाना। प्रकाश एवं पेय जल की उपलब्धता।
  2. शिक्षा-प्राप्ति तथा स्वास्थ्य-रक्षा के साधन उपलब्ध होना।
  3. चुनावों में मतदान करने का अधिकार होना।
  4. जान-मान की सुरक्षा।
  5. अपनी इच्छानुरूप परम्परागत रीतिरिवाजों, पर्वों, उत्सवों, त्यौहारों को मनाने का अधिकार।
  6. धार्मिक पूजा-अर्चना की स्वतंत्रता।
  7. सोचने-विचारने, अपने विचारों को अभिव्यक्त करने का अधिकार। Freedom of thought, Freedom of expression, Freedom of action.

सारांश यह कि जनतंत्र में नागरिक तभी सुखी, सम्पन्न और खुशहाल रह सकते हैं जबकि वे अधिकारों और कर्त्तव्यों के बीच सन्तुलन बनाये रखें-पहले अपने कर्त्तव्यों का पालन करें और बाद में अपने अधिकारों की गुहार लगायें। केवल अधिकारों की माँग करने, असन्तोष प्रकट करने, शासन के विरुद्ध नारेबाजी करने से केवल समाज में अशान्ति फैलेगी और देश की प्रगति में बाधा आयेगी।

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