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NCERT 5th Class (CBSE) Social Science: We are Proud of Them 

झांसी की रानी वीरांगना लक्ष्मीबाई पर विद्यार्थियों और बच्चों के लिए निबंध

भारतवर्ष की भूमि को वीर-प्रसू अर्थात् वीरों को जन्म देनेवाली भूमि कहा गया है। इस पावन भूमि पर असंख्य दान-वीर, दया-वीर और युद्ध-वीर हुए हैं। महाभारत के कर्ण जैसे दानवीरों तथा राजा शिवि जैसे दया वीरों की कथाएँ तो पुराणों में मिलेंगी और इनकी संख्या भी अपेक्षाकृत कम है। परन्तु भारत का इतिहास युद्ध-वीरों से पटा है। इसका कारण है यहाँ के निवासियों की जीवन-दृष्टि, उनकी सोच और उनकी मानसिकता। क्षत्रियों को बचपन से ही सिखाया जाता है कि युद्ध करना उनका धर्म है, युद्ध में प्राण देने, वीरगति को प्राप्त करने से स्वर्ग के द्वार उनके लिए खुले रहते हैं। अतः यहाँ के वीर ‘युद्धं देहि मे, का उदघोष करते हुए, हाथ में तलवार लिये, हथेली पर प्राण लिये युद्ध में कूद पड़ते हैं। उनके मन-मस्तिष्क में गीता की यह पंक्ति गूंजती रहती है –

हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे जहिम्

यदि मर गये तो तुरन्त स्वर्ग मिलेगा और यदि जीत गये तो राज करंगे, सुख का जीवन बितायेंगे। इतिहासकारों ने भी युद्ध वीरों के शौर्य, पराक्रम, त्याग, बलिदान, देशप्रेम की गाथा स्वर्णाक्षरों में लिखी है। परन्तु वीरों की तुलना में वीरांगनाएँ कम ही रही हैं। इसका कारण रहा है हमारी सामाजीक-परिवारिक व्यवस्था। फिर भी भारत का इतिहास वीरांगनाओं से शून्य नहीं है। समय-समय पर वे उत्पन्न होती रही हैं। इनमें से एक का नाम भारत के बच्चे-बच्चे की जिह्वा पर है। वह है झांसी की रानी लक्ष्मीबाई जिसके विषय में हिन्दी के विख्यात कवि श्यामनारायण पांडेय ने लिखा था –

हरबोले बुन्देलों से हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

रानी लक्ष्मीबाई के पिता मूलतः महाराष्ट्र के निवासी थे। उनके पिता का नाम मोरोपन्त तथा माता का नाम भागीरथी बाई था। इनका जन्म 1835 ई. में काशी में हुआ था। माता-पिता इन्हें मनुबाई कहकर पुकारते थे। जब केवल पाँच वर्ष की थीं तभी इनकी माता का स्वर्गवास हो गया। इनका पालन-पोषण और बचपन पेशवा बाजीराव द्वितीय के पुत्र नाना जी ने किया। नाना जी राव पेशवा इन्हें अपनी मुँह बोली बहन मानते थे और प्यार से छबीली कहते थे। आरम्भ से ही मनु को गुड्डे-गुडिया, पटोले खेलने में रूचि न होकर पुरुशोचित् कार्यों में रूचि थी। अतः वह अपने मुँहबोले भाई नाना के साथ खेलती-कूदती, कुश्ती का अभ्यास करती, तीर-तलवार आदि शस्त्रास्त्र चलाना सीखती, घुड़सवारी करते हुए अपना समय बिताने लगीं। अतः शीघ्र ही उनमें वीर पुरुषोचित गुणों-साहस, शौर्य, पराक्रम, धैर्य आदि का विकास होने लगा। वीरांगना बनने की भूमिका का आरम्भ यहीं से समझना चाहिए।

अभी मनु किशोरावस्था पार भी न कर पाई थी कि उनका विवाह झांसी के प्रौढ़ावस्था पार कर रहे राजा राव से कर दिया गया। वस्तुतः प्रौढ़ होने पर भी राजा निःसन्तान थे और पुत्र की लालसा में ही उन्होंने मनु से विवाह किया था। अब मनु या छबीली के स्थान पर रानी लक्ष्मीबाई बन गईं। अल्पायु होते हुए तथा प्रौढ़ व्यक्ति से विवाह होते हुए भी उनमें जीने की उमंग थी। अतः वह त्योहार मनातीं, मंगलोत्सवों में भाग लेतीं, झांसी की स्त्रियों को निमंत्रित कर उनके साथ हँसती, विनोद करतीं। होली उनका सबसे प्रिय त्यौहार था और उस दिन नगर की स्त्रियों के जमघट और फाग खेलने, रंग, गुलाल, अबीर उड़ने से सुने उदास-निराश झांसी और उसके राजा  गंगाधर राव के जीवन में खुशी की लहर दौड़ने लगी, वातावरण हर्षोल्लास से भर उठा। विवाह के बाद भी, पति की इच्छा न होते हुए भी वह मलखम्भ, घुड़सवारी, तीर-तलवार चलाने का अभ्यास करती रहीं। इस प्रकार रानी के आगमन ने झांसी के स्त्री-समाज में नई चेतना, नई स्फूर्ति, नई उमंग पैदा कर दी। विवाह के नौ वर्ष बाद रानी ने एक पुत्र को जन्म दिया तो चारों ओर शहनाई आदि आदि मंगल वाद्यों की मधुर ध्वनियाँ गूँजने लगीं, झांसी नई-नवेली दुल्हन की तरह सजाई गई और झांसी-निवासी मस्ती में झूम उठे; पर राजा का दुर्भाग्य-वह बच्चा तीन महीने की आयु में हीं चल बसा। राजा पर वज्रपात हुआ, वह अस्वस्थ रहने लगे और 1853 में उनका देहान्त हो गया। उस समय रानी की आयु केवल अठारह वर्ष थी। मरने से पूर्व उन्होंने अपने नाते-रिश्ते के एक बालक दामोदर राव को गोद ले लिया था। परन्तु ईस्ट इंडिया कम्पनी की सरकार ने अपनी ‘डार्क्ट्रिन ऑफ लैप्स’ की नीति के कारण  उस दत्तक पुत्र को राज्य का उत्तराधिकारी नहीं माना, झांसी को उत्तराधिकारी विहीन मानकर उसे अपने साम्राज्य का अंग घोषित कर दिया। सुनकर रानी ने दाँत पीसकर घोषणा की कि अपने जीते-जी वह अपनी झांसी पर किसी का भी अधिकार नहीं हिने देंगी। पर अंग्रेज शासक तो मदान्ध थे, उन्हें तो जैसे-तैसे अपने साम्राज्य का विस्तार करना था। अतः वह अपनी बात पर अड़े रहे।

ईस्ट इंडिया का शासन इतना क्रूर, अत्याचारी और जनता का शोषण करनेवाला था कि भारतवासियों में – हिन्दू-मुसलमान दोनों में असन्तोष और आक्रोश की ज्वाला भीतर ही भीतर धधक रही थी। अंग्रेजों की सेना में भारतीय सैनिक भी इस ज्वाला से अछूते नहीं थे। अतः कुछ देशी राजाओं, नवाबों और विद्रोही सैनिकों ने मिलकर ब्रिटिश शासन को उखाड़ फेंकने की योजना बनाई जिसे अंग्रेजों ने सिपाही-विद्रोह और भारत के इतिहासकारों ने प्रथम स्वतंत्रता-संग्राम नाम दिया। इन विद्रोहियों को झांसी की रानी का समर्थन प्राप्त था। दुर्भाग्यवश विद्रोह करनेवाले असंगठित थे, उनके बीच तालमेल न था। अतः निश्चित तिथि से एक दिन पूर्व ही कुछ सैनिकों ने संघर्ष का बिगुल बजा दिया। ब्रिटिश शासक सजग हो गये, उनके पास तोपें थी, उनके अधीन सैनिक अनुशासित थे, संगठित थे। अतः उन्होंने बड़ी बेरहमी से इस आन्दोलन को कुचल दिया हजारों को पेड़ों की शाखा पर फाँसी का फन्दा डालकर मार डाला गया। झांसी में भी रानी की आज्ञा के बिना कुछ सैनिकों ने कुछ अंग्रेजों को मार डाला, कुछ को बन्दी बना लिया। इस पर ह्ययू  रोज के नेतृत्व में विशाल सेना ने झांसी को घेर लिया। रानी ने डटकर ह्ययू रोज का मुकाबला किया पर कुछ तो सैनिकों की संख्या कम होने, अंग्रेजों की तोपों के मुकाबले तोपें कम प्रवाह करनेवाली होने और कुछ देशविद्रोहियों के कारण रानी अधिक दिन तक टिक न सकीं, उन्हें झांसी छोड़ने पड़ी। वहाँ से वह कालपी गईं, फिर ग्वालियर पहुँची। ग्वालियर के युद्ध में उन्होंने अंग्रेजों के छक्के छुड़ा दिये, ग्वालियर के किले पर अधिकार भी हो गया परन्तु अदूरदर्शी तथा विलासी नाना साहब और राव साहब विजय की खुशी में जश्न मनाने लगे और अंग्रेज सेना पुनः धावा बोल दिया। घमासान युद्ध हुआ। रानी अपने दत्तक पुत्र को पीठ पर बाँधे, घोड़ा पर बैठकर शत्रु से लोहा ले रही थीं पर जब उन्होंने देखा कि अकेली रह गई हैं तो अपने पवित्र शरीर को अंग्रेजों के अपावन स्पर्श से बचाने के लिए भागीं। दुर्भाग्यवश उनका घोड़ा एक नाला सामने देख अड़ गया। रानी का पीछा करती अंग्रेज सेना की एक टुकड़ी ने उन्हें घेर लिया और किसी सैनिक की बन्दूक की गोली ने उनके प्राण ले लिये। उनको घोड़े से गिरते देख पास ही खड़ा एक किसान उनका शव पास की झोपड़ी में ले गया और उसने झोपड़ी में आग लगा दी ताकि अंग्रजों के अपावन स्पर्श से उनका शरीर कलंकित न हो। रानी लक्ष्मीबाई मरकर भी अमर हो गईं और जिस स्वतंत्रता के यज्ञ में वह आहुति बनीं वह उनकी मृत्यु के लगभग सौ वर्ष बाद पूरा हुआ। 1947 ई. में देश स्वतंत्र हो गया।

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