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Maithili Sharan Gupt

मनुष्य है वही कि जो मनुष्य के लिए मरे: हिंदी निबंध

राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त की इन पंक्तियों में मरने का अर्थ केवल मरना नहीं हैं, अपितु समाज, देश, सम्पूर्ण मानवजाती के हित के लिए त्याग, बलिदान, परोपकार करते हुए यदि आवश्यकता पड़े तो प्राण दान भी है। मनुष्य की मनुष्यता, मानवता केवल अपना पेट भरने में नहीं है, पेट तो कुत्ते, बिल्ली, पक्षी भी भर लेते हैं। मनुष्यता है परहित में अपना सम्पूर्ण जीवन समर्पित करने में।

मैथिली शरण गुप्त की रचना “मनुष्यता” से ली गयी पंगती “मनुष्य है वही कि जो मनुष्य के लिए मरे” पर हिंदी निबंध

यदि जीवन का आरम्भ जन्म है तो उसका पर्यवसान को सार्थक करके ही मरना शोभा देता है। सार्थकता और सफलता है मानवता के कल्याण-कार्य करने में ताकि मरने के बाद भी लोग उसे याद रखें, वह अमर हो जाये। किसी महान उद्देश्य को लेकर जीना और उसकी पूर्ति में जीवन बिताना ही सफल जीवन है। मानव-मात्र के हित के लिए कार्य करते-करते ही मरनेवाले अपने पीछे अपना आदर्श छोड़ जाते हैं, लॉगफैलो के शब्दों में समय की बालू अपने पैरों के चिन्ह छोड़ जाते हैं और आगे आनेवाली पीढियाँ उनका अनुगमन करती हैं; लोग ऐसे महापुरुषों को सदा याद रखते हैं। ये लोग आनेवाली पीढियाँ उनका अनुगमन करती हैं; लोग ऐसे महापुरुषों को सदा याद रखते हैं। ये लोग क्षुद्र स्वार्थों के लिए नहीं सम्पूर्ण मानवजाति के कल्याणार्थ जीते हैं और उसी के लिए मरते हैं।

सामान्य मानव अपने लिए भी जीता है तथा साथ ही समाज के अन्य व्यक्तियों के लिए भी कुछ न कुछ कार्य करता है। वह सामाजिक प्राणी है, एक को दूसरे का सहयोग आवश्यक है। सहकारी संस्थाएँ यही कार्य करती हैं। किसान वर्ष भर परिश्रम करता है अपने और अपने परिवार के भरण-पोषण के लिए भी तथा सामान्य जनता की भोजन की आवश्यकताएँ – अनाज, दलहन, तिलहन पूरी करने के लिए भी। मजदूर मीलों में काम करते हैं अपनी आजीविका के लिए भी था दूसरों के लिए वस्त्र, चीनी, मनोरंजन के उपकरण बनाने के लिए भी। युद्ध के मोर्चे पर या देश की सीमाओं पर अनेक कष्ट झेलनेवाले तथा प्राणों की आहुति देने के लिए तत्पर सैनिक वेतन से अधिक देश और देशवासियों की सुरक्षा के लिए अपना कार्य करते हैं। पर इनसे भी अधिक गौरव एवं श्रद्धा के पात्र वे महापुरुष हैं जो अपने लिए नहीं, समाज, देश या मानवजाती के कल्याण के लिए कार्य करते हैं, कबीर की तरह अपना घर फूँक कर दूसरों की सहायता करते हैं-

कबिरा खड़ा बाजार में लिए लुकाटी हाथ
जो घर फूँके आपनो, चले हमारे साथ।

इतिहास में वे ही अमर हैं जिन्होंने महान सत्य के लिए, मानवता के हित के लिए यातनाएँ सही और अंत में मृत्यु का आलिंगन किया। मंसूर ने मानवता की भलाई के लिए विष का प्याला पीया, सौक्रेटीज ने जहर पिया, मीरा ने राणा द्वारा विष का प्याला अमृत की तरह पी लिया, ईसा मसीह सलीब पर चढ़ गये, गांधी ने साम्प्रदायिक सद्भाव पैदा करने के लिए नौखावाली की गलियों और बाजारों की धूल सटकी और नाथूराम गोडसे की गोली के शिकार हुए; भगतसिंह ने सरफरोशी की तमन्ना का नगमा गाते हुए फाँसी का फंदा स्वयं अपने गले में लटका लिया, सुभाष चन्द्र बोस ने देश की स्वतंत्रता के लिए जान की बाजी लगाकर जर्मनी, जापान की यात्रा की, आजाद हिन्द फौज बनायी, अंग्रेजों से लड़े और प्राण विसर्जित कर दिये। ये सब पूज्य हैं, वन्दनीय हैं, केवल भारत के लिए ही नहीं सम्पूर्ण मानवजाति के लिए, वे अमर हो गये और विश्व का इतिहास उन्हें सदा याद रखेगा। मनुष्य के लिए मर-मिटने की साध में अपूर्व आत्मिक सुख है। एक फकीर ने एक जालिम बादशाह की हिंसा-वृत्ति की शान्ति के लिए अपने शरीर की चमड़ी अपने ही हाथों से उधेड़ कर बादशाह को सौंप दी। वह सत्य की रक्षा के लिए शहीद हो गया, तभी तो दिल्ली के लाल किले और जामा मस्जिद के सामने बने उसके मजार पर आज भी हजारों मनुष्य श्रद्धा के फूल प्रतिदिन अर्पित करते हैं।

इतिहास क्या है? मनुष्यों के कारनामों का लेखा-जोखा ही तो इतिहास है। किसी के कारनामे पढकर हम वितृष्णा से नाक-भौं सिकोड़ लेते हैं, जबकि किसी अन्य के कारनामे पढकर हमारा सीना फूल उठता है और सिर अपार श्रद्धा-भक्ति से झुक जाता है। क्यों, इतिहास इन मरने वालों की कहानी और लेखा-जोखा ही तो है। नहीं, केवल इतना ही इतिहास नहीं है। वह एक ओर तो उन लोगों का ब्यौरा देता है, जो केवल अपने लीए जीए और अपने लिए ही मरे भी। उनका ब्यौरा पढकर ही वितृष्णा से हमारी भवें तन जाती हैं। दूसरी ओर वह उन् लोगों का ब्यौरा हमें सुनाता है जो अपने लिए नहीं बल्कि मनुष्यों और मनुष्यता की रक्षा के लिए जिये और मरे। तभी तो हमारा मस्तक उनके सामने अपने-आप ही झुक जाता है। ऐसे लोगों को हम देश-काल की सीमाओं से ऊपर उठकर आदर्श पुरुष कहकर श्रद्धा-भक्ति से नमन करते हैं। यह नहीं देखते कि वह भारतीय हैं या अभारतीय, हिन्दू है या मुसलमान।नहीं, उसे तो हम केवल मनुष्य मानकर ही पूजते हैं। इसलिए पूजते हैं कि वे जिये तो मनुष्य के लिए, मरे तो मनुष्य के लिए और इसलिए वे सभी प्रकार से पूर्ण मनुष्य थे।

मनुष्य और मनुष्यता के लिए मर-मिटने की साध और दम-खम वाले व्यक्ति ही जातियों, देशों और राष्ट्रों का निर्माण करते हैं, उनका इतिहास और संस्कृतियाँ बनाते हैं। उनके लिए समुन्नत एवं समतल जीवन-पथ का निर्माण किया करते हैं। उनके लिए सबका दर्द अपना और अपना दर्द सबका बन जाया करता है। उनकी दृष्टि में सबको प्रसन्नता ही अपनी प्रसन्नता और सबकी जीत ही अपनी जीत बन जाया करती है। उनके लक्ष्य एवं उद्देश्य तुच्छ स्वार्थों से परिचालित कभी नहीं हुआ करते, बल्कि महत् मानवीय हितों की भावना से अनुप्रमाणित रहा करते हैं। यह इसलिए कि वे मनुष्य होते हैं – विशुद्ध मनुष्य।

जिस किसी ने भी मानवीय मूल्यों की रक्षा की, उसी को मानव एवं इतिहास ने सिर-आँखों पर बिठा कर अमरत्व प्रदान कर दिया। मानव-हिताय मरण व्यर्थ न जा कर सार्थक हुआ करता है। उससे मरने वाले के साथ-साथ मानवता का मस्तक भी गर्व और गौरव से उन्नत हुआ करता है। इसलिए व्यक्ति को स्वार्थ-त्याग के लिए हमेशा तत्पर रहना चाहिए।

मनुष्य है वही कि जो मनुष्य के लिए मरे‘ हमारे विचार में इस सूक्ति की यही सच्ची व्याख्या है। सुक्तिकर ने हर प्रकार से मानवीयता की उदात-उदार भावना को जीवन्त बनाए रखने की प्रेरणा देने के लिए ही इस कथन का सृजन किया है।

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