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मकर संक्रांति पर हिन्दी निबंध विद्यार्थियों के लिए

मकर संक्रांति पर हिन्दी निबंध विद्यार्थियों के लिए

भारतवर्ष में मनाये जानेवाले त्यौहारों के तीन आधार हैं- धार्मिक-अध्यात्मिक, ऋतुएँ और फसल तथा स्वस्थ-सुखी जीवन बिताने की प्रवृत्ति। मानव जीवन में वही व्यक्ति सुखी रह सकता है जिसका शरीर स्वस्थ हो और मन पवित्र, आत्मा शुद्ध हो। जब मनुष्य का अंतःकरण शुद्ध तथा शरीर स्वस्थ रहेगा तभी वह आनन्द से जीवन बिता पायेगा। मकर संक्रान्ति का पावन पर्व भी इसी दृष्टि से मनाया जाता है।

भारतीय काल-गणना के अनुसार मकर संक्रान्ति का पर्व माघ मास की पहली तिथि को मनाया जाता है जो सदा चौदह जनवरी को पड़ती है। माघ मास की संक्रान्ति के दिन मनाये जाने के कारण इसके दो नाम और भी हैं-माघी का त्यौहार और माघोत्स्व। सूर्य के राशी-चक्र के हिसाब से इसी दिन सूर्य देवता मकर राशी में प्रवेश करते हैं इसलिए यह पर्व मकर संक्रान्ति के नाम से पुकारा जाता है।

भारत में, विशेषतः उत्तर भारत में पौष मास और माघ मास शीत ऋतु के प्रमुख महीने हैं। पहाड़ों पर हिमपात होता है और मैदानों में धुंध, पाला, ठोस, ठंडी हवाओं के कारण सर्दी अपने चरमोत्कर्ष पर पहुँच जाती है। धरती पाले और ओस के कारण सफेद तथा दिशाएँ धुंध-भरी हो जाती हैं। कभी-कभी इतना घना कोहरा पड़ता है कि रेलगाड़ियों को बहुत धीमी गति से चलाया जाता है, विमानों की उड़ानों में कई घंटों की देर हो जाती है। गरीब लोग आग तपते हैं और सम्पन्न लोगों के घरों में रूम-हीटर जलने लगते हैं। जीना कठिन हो जाता है।

मकर संक्रांति पर हिन्दी निबंध विद्यार्थियों और बच्चों के लिए

परन्तु भारत में धार्मिक मनोवृति के लोगों की संख्या भी कम नहीं है। इस कड़ाके की सर्दी में भी ये लोग प्रातःकाल उठते हैं, ओस, पाला, धुंध, ठंडी हवाओं की परवाह न कर पास के सरोवर या नदी में स्नान के बाद घरों में या फिर मन्दिरों, उपासना-स्थलों में जाकर पूजा-अर्चना करते हैं, धार्मिक प्रवचन सुनते हैं और ब्राह्मणों को दान-दक्षिणा देते हैं तथा गरीबों को भोजन खिलते हैं। प्रयाग में तो त्रिवेणी के संगम पर पूरे महीने धार्मिक अनुष्ठान होते हैं, हजारों साधु वैरागी वहाँ एकत्र होते हैं, गृहस्थ ओग मैदान में बनी झोपड़ियों में रहकर कल्प करते हैं। प्रातःकाल और सन्ध्या समय सारा वायुमंडल भजन-कीर्तन-प्रवचनों की मधुर ध्वनियों से गूँज उठता है, हवन-कुंडों में डाली गई सुगन्धित पदार्थों की आहुति से वातावरण महकने लगता है। हिन्दुओं में दान-दक्षिणा को मोक्ष प्राप्ति का एक उपाय माना जाता है। अतः बहुत-से लोग दाल-चावल, खिचड़ी, तिल के बने पदार्थ दान देते हैं। गरीबों, भिखारियों को भोजन कराया जाता है। मकर संक्रान्ति के दिन ये धार्मिक अनुष्ठान अपने चरम पर पहुँच जाते हैं। इस दिन धार्मिक वृत्ति वाले निर्जल व्रत-उपवास रखते हैं, सारा दिन पूजा-अनुष्ठान में बिताते हैं। इन् सब कार्यों से उनका मन पवित्र, आत्मा शुद्ध, भाव निष्कलुष और विचार उदात्त बनते हैं। अतः उनके अध्यात्मिक-आत्मिक विकास में यह पर्व महत्त्वपूर्ण भूमिका निबाहता है।

भारत में तीन महीनों के अतिरिक्त शेष नौ मास गर्मी पड़ती है। अतः भारतवासी गर्मी के तो असभ्य होते हैं पर सर्दी का मौसम उनके लिए कष्टकर होता है। भारतवासियों की इसी शारीरिक स्थिति को देखकर हमारे पूर्वजों ने भोजन के सम्बन्ध में सुझाव रखे जिनका पालन करने से हमारा शरीर सर्दी की भीषणता को, सर्दी के मौसम में होनेवाले रागों से सुरक्षित रह सके। शरीर को स्वस्थ, निरोग, हृष्ट पुष्ट रखने के लिए, शरीर में रक्त का संचार सुचारू ढंग से होता रहे, उष्मा बनी रहे इसके लिए उन् पदार्थों के सेवन का परामर्श दिया गया है जिनकी तासीर गर्म होती है। ये पदार्थ हैं-गुड़, तिल गरीबों की मेवा मूँगफली, शुद्ध घी। माघ मास में सम्पन्न लोग, मध्यम वर्ग के लोग भोजन में इन पदार्थों का प्रयोग करते हैं, गरीब लोग भी यथासाध्य इनका प्रयोग करते हैं। जो नितान्त अभावग्रस्त हैं उनके लिए इन पदार्थों के दान दिये जाने का रिवाज है। अतः मकर संक्रान्ति के दिन अपेक्षाकृत सम्पन्न लोग गुड़, तिल, घी, खिचड़ी, मूँगफली का दान किया करते हैं। ऋतु की भीषणता से संघर्ष करने की घोषणा करने का भी यह एक शुभ दिन है।

मकर संक्रान्ति का त्यौहार हर्षोल्लास, खुशियाँ मनाने, सजने-सँवरने का पर्व न होकर, धार्मिक-अध्यात्मिक विकास का अवसर प्रदान करनेवाला त्यौहार है, शरीर को स्वस्थ और हृष्ट-पुष्ट बनाये रखने के उपाय बतानेवाला पर्व है। उसका सम्बन्ध ऋतु-चक्र से भी है क्योंकि सूर्य देवता इसी दिन मकर राशी में प्रवेश करते हैं। यह त्यौहार एक और कटु यथार्थ को स्वीकार कर उसकी कटुता को कम करने के लिए प्रयत्नशील होने का आह्वान करता है तथा दूसरी ओर हमें धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है।

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