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संत कवि कबीर

क्रान्तिदृष्टा संत कवि कबीर पर विद्य्राथियों और बच्चों के लिए निबंध

काव्य कवि के बाह्य और भीतरी परिवेश के सम्पर्क से गढ़ी गई कला है। चिन्तन और भावना द्वारा कवि अपने काव्य में समाज की अभिव्यक्ति करता है। साथी ही वह उसके सम्बन्ध में मानसिक एवं हार्दिक प्रतिक्रिया भी व्यक्त करता है। महात्मा कबीर का प्रादुर्भाव ऐसे संक्रान्ति-युग में हुआ जब समाज विश्रंखलित था और महान संघर्ष के बीच से गुजर रहा था। हिन्दू और मुसलमान पारस्परिक द्वैष और वैमनस्य के कारण आपस में लड़ते रहते थे। दोनों में ही बाह्याम्बर का बोलबाला था। धर्म कर ठेकेदारों की संकीर्ण विचारधारा से समाज और धर्म में अव्यवस्था बढ़ती जाती है जा रही थी। कर्मकांड का आधिक्य था और तीर्थाटन, व्रत, उपवास आदि को ही धर्म का परम-तत्व माना जाता था। कर्मकांडी ब्राह्मणम और मुल्ला-मौलवी, जो स्वयं तत्व-ज्ञान से अनभिज्ञ थे, जनता को ठग इ थे। बौद्ध धर्म की पतन के गर्त में गिर रहा था। हिन्दुओं के वीभिन्न सम्प्रदाय-शैव-शाक्त, नाथपंथी, तांत्रिक, जैनी, बौद्ध, वैष्णव,निर्गुनिया आदि  बखेड़ा खड़ा कर रहे थे। वे  सब दुराचरण में लीन थे, अपनी-अपनी धुन में मस्त थे, एक दुसरे पर कीचड़ उछाल रहे थे।

कबीर सहज में आस्था रखनेवाले मानवतावादी थे। किसी रूढी और  अंध-परम्परा से उनका लगाव न था। हृदय की  स्वच्छ कसौटी पर विवेक की जो खरी लीक बनती, उसे ही वह सही मानते थे। उनके पास सत्य की शक्ति के कुकृत्यों को देख उनका हृदय मर्माहत हो उठा। उनकी मान्यता थी कि एक ही ईश्वर सबमें व्याप्त है। अतः उन्होंने   मध्ययुग के वातावरण में ज्ञान-सूर्य की रश्मियों द्वारा मानवता के मार्ग का निर्देशन किया। लगता है  बाह्याडम्बर के  झाड़- झखाड को उखाड़ फेंकने के लिए ही भगवान ने उनको भेजा था और उनके व्यक्तित्व में परस्पर-विरोधी गुणों का समावेश कर उन्हें नृसिंहवातार के रूप में आविभूर्त किया था जिससे युग की विकृतियाँ रुपी हिरण्यकश्यप विदीर्ण की जा सकें।

कुछ विद्वानों का अभिमत है कि कबीर मूलतः साधक थे, उनका-सुधारक रूप गौण है। यह सत्य है कि कबीर मूलतः साधक थे, पर वह जनता के सीधे सम्पर्क में आनेवाले व्यक्ति थे और समाज में व्याप्त बुराइयों के मात्र मूक  प्रेक्षक नहीं थे। उन्होंने  हिन्दू-मुसलमानों की भलाई-बुराई देखी, उनकी केवल आलोचना ही नहीं की,  उन्हें मार्ग भी दिखाया। समाज-कल्याण कबीर वाणी की प्रेरणा बना।

हिन्दी में कबीर से बड़ा मानवतावादी कोई नहीं हुआ। मानव-मात्र का कल्याण उनका लक्ष्य था। अतः उन्होंने निष्पक्ष और निर्द्वन्द्व होकर मिथ्या मार्ग पर चलनेवालों को ठीक राह पर लाने का प्रयत्न किया और कहा, “अरे इन दोहुन राह पाई।” जन्म के आधर पर भेद-भाव उन्हें अमान्य था। इसीलिए उन्होंने ब्राह्मणों पर करारा व्यंग्य करते हुए उन्हें चुनौती दी:

जो तू वामन वामनि जाया,
आन बाट तैं काहे न आया।।

कुल-अभिमान और अस्पृश्यता को वह अभिशाप मानते थे, अतएव उनका खंडन करते हुए उन्होंने धर्म के ठेकेदारों को ललकारा:

काहे की कीजै पांडे छोति विचारा।
छोतहि ते उपजा संसारा ।।

बाह्याचार का विरोध कर कबीर ने पंडितों और मुल्लाओं की पोल-पट्टी खोलकर जनता के सामने उन्हें अनावृत्त कर दिया। कहीं वह व्रत-उपवास की खिल्ली उड़ाते हैं, तो कहीं मूर्ति-पूजा पर व्यंग्य करते हैं:

पाथर पूजै हरि मिले तो मैं पूंजूं पहार।
ताते तो चाकी भली पीस खाय संसार।।

गेरुवा वस्त्र पहनने, केश मुड़ाने, माला फेरने और छापा-तिलक लगाने को मिथ्याचार बताते हुए वह उनसे बचने का उपदेश देते हैं:

माला तो कर में फिरै जीभ फिरै मुख मांहि।
मनवा तो दहुं दिसी फिरै सो तौ सुमिरन नाहीं।।

केश मुंड़ाने के विरुद्ध अपनी प्रतिक्रिया बताते हुए वह भेड़ का उदाहरण देते हैं और केशों के स्थान पर मन की शुद्धि पर बल देते हैं:

केसन कहा बिगारिया जो मूंड़ै सौ बार।
मन को काहे न मूंड़िये जामें भरे विकार।।

गंगा-स्नान और तीर्थाटन को व्यर्थ बताकर वह भगवद्-भक्ति और साधू-संगति पर बल देते हैं:

मथुरा जावै द्वारिका भावै जावै जगन्नाथ।
साधु संगति हरि भगति बिन कछु न आवै हाथ।।

हिन्दुओं की भांति इस्लाम के ठेकेदारों ने भी मुस्लिम समाज में मिथ्या आचरण और मिथ्याडम्बर को प्रश्रय दे रखा था जिससे वे लोग पथ-भ्रष्ट हो रहे थे। कबीर ने रोजा, नमाज, हिंसा, सुन्नत और कुरान पढनेवाले धर्म के ठेकेदारों पर निर्मम प्रहार किया:

खून करै मिसकीन कहावै गुनहा रहै छिपाय।

कहीं स्पष्ट शब्दों में तो कहीं व्यंग्य द्वारा रोजा रखनेवालों का मजाक उड़ाते हुए उन्होंने कहा:

दिन भर रोजा रखत हैं, रात हनत हैं गाय।

इसी प्रकार नमाज पढने की हंसी उड़ाते हुए उन्होंने कहा:

मस्जिद भीतर मुल्ला पुकारे क्या साहिब तेरा बहरा है।

कबीर शास्त्र-ज्ञान से अधिक महत्त्व प्रेम और भक्ति को देते थे। अतः काजी और पंडित की भर्त्सना करते हुए उन्होंने कहा:

पोथी पढ़ी-पढ़ी जग मुवा पंडित भया न कोय।
ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय।।

वह हज करने से अधिक हृदय को पवित्र बनाने पर बल देते हैं:

सेब सबूरी बहिरा का हज काबे जाय।
जिनका दिल स्याबत नहीं तिनको कहा खुदाय।।

कबीर के व्यंग्य तीखे हैं, पर सर्वत्र उनकी वाणी के पीछे सत्य की निष्ठा और संत-हृदय की सुहानुभूति है। वह जानते थे कि धर्म  दर्शन के क्षेत्र में बड़ा उत्पात मचा हुआ है। अतः उन्होंने साधु की व्याख्या करते हुए कहा:

साधु ऐसा चाहिए जैसा सूप सुभाय।
सार-सार को गहि रहे थोथा देय उड़ाय।।

ईश्वर सबका है, वह भेद-भाव से परे है, इसका उद्घोष करते हुए उन्होंने सबको भगवान की शरण में जाने का उद्बोधन दिया:

जाति-पांति जानै नहिं कोई हरी कौ भजै  सौ हरि का होई।

कबीर ने खंडनात्मक शैली में जो कुछ कहा उसमें मानवता की पुकार है। इसीलिए जीवन  सरलता, हृदय की निष्कपटता,  की शुद्धता और नैतिक संयम उनके सामाजिक सुधारों का प्रमुख लक्ष्य था। उन्होंने सर्वत्र शुद्धाचरण पर बल दिया। आचार्य द्विवेदी का कथन है:

“उन्होंने रोग का ठीक निदान किया या नहीं  इसमें दो मत हो सकते हैं, पर औषधि-निर्वाचन में उन्होंने बिलकुल गलती नहीं की। यह औषधि है भगवद्-विश्वास।”

शूद्रों और दलितों में आत्म-विश्वास जगानेवाले महात्माओं के कबीर का स्थान बहुत ऊँचा है। उनका मन जिस प्रेम-रूपी मदिरा  से मतवाला बना हुआ  था, वह ज्ञान के   गुड़ से तैयार की गई थी। इसीलिए अंध श्रद्धा, भावुकता   और हिस्ट्रीरिक प्रेमोन्माद का उनमें  एकांत अभाव था। क्रांतिकारी थे, उन्हीं क्रन्तिकारी लोक-कवि कहना  उचित है।

आज भी भारतीय समाज में दम्भ, पाखंड, छल-छद्म, कपट, मिथ्याचरण का बोलबाला है। समता और मानव-एकता की विरोधी शक्तियाँ आज भी सक्रिय हैं। वर्ण-भेद और हिंसा को आज भी हम गले लगाए हुए हैं। आज की परिस्थितियाँ कबीर के युग की परिस्थियों से कम जटिल नहीं हैं। हिन्दू-मुस्लिम वैमनस्य भी भले ही बाहर  से प्रकट न   हो रहा हो, भीतर ही भीतर सुलग रहा है।  कबीर ने अपनी वाणी द्वारा समाज की विकृतियों का विरोध किया था, उन्हें जड़मूल से उखाड़ फेंकने का प्रयास किया था। वह समाज की एकता के पुजारी और मानव-अखंडता के सच्चे प्रहरी थे। व्यक्त और अव्यक्त के बीच जो भ्रम-भेद है, उन्होंने   उस पर आघात किया, सामाजिक भेद-भाव की गुत्थियों को सुलझाने का प्रयत्न किया और हिन्दू-मुसलमान में प्रेम की वह सुदृढ़ आधार-शिला रखी जिस पर आज की धर्म-निरपेक्ष निति का प्रासाद खड़ा है समाजवाद का जो नारा आज वातावरण में सर्वत्र गूंज रहा है और जिसे लाने के लिए हर भरसक प्रयत्न किया जा रहा है, कबीर उस समाजवाद के सशक्त पक्षधर थे। यह ठीक है कि उसके समाजवाद में ईश्वर-भक्ति और धर्म   का निषेध नहीं है परन्तु जिस साम्य की उन्होंने प्रतिष्ठा की है वह   अधिक सुदृढ़ है। उनका धर्म मानव धर्म है जिसमें मनुष्य-मनुष्य की समता, मानव एकता और सत्य को पूरी तरह प्रतिष्ठित किया गया  है। शक्ति और सत्ता के मद में चूर हुए मानव  को सतर्क करते हुए वह निर्बल के प्रति सहानुभूति पैदा करते हैं:

निर्बल को न सताइये जाकी मोती हाय।
मुई खाल की श्वास सौं लौह भसम है जाय।।

संसार की नश्वरता, शरीर का क्षण-भंगुरता और आत्मा की अमरता दिखलाकर कबीर कहीं भय दिखाकर, कहीं भर्त्सना करके और कहीं भक्ति द्वारा जब मानव को सन्मार्ग पर चलने का परामर्श देते हैं तो आज का पाठक भी उनकी बात को ध्यान से सुनने और उनके बताये पद-चिन्हों पर चलने की प्रेरणा प्राप्त करता है। देश की वर्तमान स्थिति में उनकी वाणी की यही  सार्थकता है। मनुष्य की आत्मा की निर्मलता, परस्पर सौहार्द एवं सद्भाव, सात्विक विचार, अहंकार से मुक्ति, जीव-मात्र पर दया, ये सब   नवमानवतावाद के ही विचार-बिन्दु हैं जिनकी प्रतिष्ठा कबीर के काव्य में हुई है।

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