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स्वतंत्रता दिवस पर निबंध Hindi Essay on Independence Day

स्वतंत्रता दिवस पर निबंध विद्यार्थियों और बच्चों के लिए

स्वतंत्रता दिवस / 15 अगस्त पर निबंध [2]

1857 ई. साम्राज्यवादी, शोषक, अत्याचारी ब्रटिश शासन के विरुद्ध पहला विद्रोह हुआ, अंग्रेजी शासन को उखाड़ फेंकने का सामूहिक प्रयत्न किया गया। ब्रिटिश इतिहासकार इस विद्रोह को सैनिकों विद्रोह (सिपौय म्युटिनी) कहते हैं क्योंकि कारतूसों को लेकर उनकी सेना के कुछ सैनिकों विद्रोह किया था। जो कत्लेआम अंग्रेजी ने भारत की जनता का किया, जो जुल्म ढोहे उनके कारण इसे ‘गदर’ नाम भी दिया जाता है। भारतीय इतिहासकार इसे प्राथन स्वतंत्रता-संग्राम कहते हैं। परन्तु वस्तुतः दोनों मत पूर्ण सत्य न होकर केवल अर्ध-सत्य हैं। यह संघर्ष केवल ब्रिटिश सेना के कुछ हिन्दू-मुसलमान सैनिकों तक सिमित न था। उसमें सक्रिय रूप से भाग लेनेवाले तथा ब्रिटिश शासन से मुक्त होने के लिए संघर्ष करनेवाले राजपूत राजा, मुसलमान, जागीदार, उनकी सेनाएँ और स्वतंत्रता-चेत्ता नागरिक भी थे। झांसी की रानी, टीपू सुल्तान, अवध की बेगमें लखनऊ के जागीदार भी उसमें शामिल थे। दूसरी और से स्वतंत्रता-संग्राम भी नहीं कहा जा सकता क्योंकि उसमें सभी भारत के नरेशों, भारत की सम्पूर्ण जनता ने, भारत के सभी प्रदेशों ने भाग नहीं लिया था। देश की एकता, अखंडता, सार्वभौम सत्ता की भावना का भी अभाव था।

हर वर्ष 15 अगस्त / स्वतंत्रता दिवस राष्ट्रीय पर्व के रूप में मनाया जाता है…

वस्तुतः 1857 के बाद अंग्रेजों की दमन-नीति ने जो विकराल रूप धारण किया, हमारे धार्मिक-संस्कृतिक-वैयक्तिक जीवन में हस्तक्षेप करना शुरू किया, काले कानून बनाये, तो देश की जनता के कान खड़े हुए। देश के बुद्धिजीवियों की आत्मा तड़प उठी और उन्होंने सामाजिक-राजनितिक स्तर पर मुक्त होने के लिए प्रयास आरम्भ किये-अनेक संस्थाएँ, समितियाँ, क्रन्तिकारी दल, राजनितिक पार्टियाँ बनी। उन्होंने अपनी-अपनी तरह से ब्रिटिश शासन का विरोध किया।

गांधी जी के अफ्रीका से लौटने पर जब उन्होंने इस आजादी की मुहीम की बागडोर सम्भाली, स्वतंत्रता सेनानियों का नेतृत्व किया, विभिन्न अहिंसात्मक आन्दोलन-नमक आन्दोलन, खेड़ा का सत्याग्रह, चम्पारण का सत्याग्रह, असहयोग आन्दोलन और अन्त में 1942 में भारत छोड़ो आन्दोलन का बिगुल बजाया तो देश में तथा अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर कुछ ऐसे परिवर्तन हुए, ऐसी परिस्थियाँ उत्पन्न हुई कि अंगेजों ने भारत छोड़ने का निर्णय कर लिया। जाते-जाते भी उनकी कूटनीति के विषवृक्ष में फल लगे, देश के दो टुकड़े हो गये, भारत और पाकिस्तान नामक दो राष्ट्र बने। मुस्लिम राष्ट्र पाकिस्तान का जन्म चौदह अगस्त को तथा भारत का जन्म पन्द्रह अगस्त 1947 को हुआ। चौदह अगस्त की आधी रात बीतते ही, घड़ी में रात के बारह बजते ही यूनियन जैक के स्थान पर भारत का तिरंगा झंडा लहराने लगा।

स्वतंत्रता का सूर्योदय पन्द्रह अगस्त को हुआ था। अतः उसी की पावन स्मृति में पन्द्रह अगस्त को स्वतंत्रता-दिवस के रूप में मनाया जाता है। वैसे तो यह दिन भारत के कोने-कोने, हर गाँव, कस्बे, नगर, महानगर में मनाया जाता है, विदेशों में रहनेवाले भारतीय एवं भारत के विदेशों में स्थित दूतावास भी इस पर्व को हर्षोल्लास से मानते हैं, राष्ट्रीय ध्वज फहराया जाता है, रोशनी की जाती हैं, भोजों का आयोजन होता है परन्तु इस दिन को केन्द्रीय एवं राष्ट्रीय स्तर पर मनाया जाता है देश की राजधानी दिल्ली के ऐतिहासिक लालकिले के आगे के लम्बे-चौड़े मैदान में।

कई दिन पहले से चाँदनी चौक की ओर किले मुख्य द्वार के सामने वाले मैदान में विशिष्ट अतिथियों और आम नागरिकों को उत्सव देखने के लिए बैठने-खड़े होने के स्थान बनाये जाने लगते हैं। विद्यालयों, महाविद्यालयों के छात्रों एन.सी.सी. (NCC) के कैडेटों, सेना, अर्धसैनिक दलों के सैनिकों के लिए भी स्थान नियत होता है। वे प्रातःकाल ही उस नियत स्थान पर पहुँच जाते हैं और जब प्रधानमन्त्री उनकी गारद का निरिक्षण करने उनके पास से गुजरते हैं तो ये लोग उनको सलामी देकर उनका अभिवादन-अभिनन्दन करते हैं। झंडा फहराने के बाद तोप दागने का स्थान भी सुनिश्चित होता है।

स्वतंत्रता दिवस को प्रातःकाल, सूर्योदय से पूर्व ही प्रधानमंत्री पहले यमुना-तट पर स्थित नेताओं की समाधियों पर जाकर महात्मा गांधी, पं. नेहरू, लाल बहादुर शास्त्री को श्रद्धा-सुमन अर्पित करते हैं, उनके प्रति आभार प्रकट करते हैं, कुछ क्षण तक मौन रहकर उनको स्मरण करते हैं। वहाँ से लालकिले की ओर बढ़ते समय वह मार्ग में अमर जवान ज्योति पर कुछ क्षण रुककर शहीदों को श्रद्धांजली अर्पित करते हैं। उसके बाद जब उनकी करों का कलिफा लालकिले पर पहुँचता है तो वह सेना के तीनों अगों: थल सेना, जल सेना, वायु सेना के सैनिकों तथा अन्य अर्धसैनिको दलों के जवानों की परेड का निरीक्षण करते हैं, सलामी लेते हैं। विशिष्ट गणमान्य विदेशी अतिथियों तथा प्रतिष्ठित नागरिकों का अभिवादन स्वीकार करते हुए प्रधानमंत्री लाल किले की प्राचीर पर पहुँचते हैं। प्राचीर पर लगे राष्ट्रीय ध्वज आरोहण करते हैं, झंडे में लिपटे पुष्प बिखरते हैं तो एक अजीब समाँ बन जाता है राष्ट्र गान होता है। ध्वज को सैनिक, छात्र छात्राएँ सलामी देते हैं, इक्कीस तोपों की सलामी दी जाती है। तदुपरान्त प्रधानमंत्री लाल किले की प्राचीर से भाषण देते है। इस भाषण में में विगत वर्ष की उपलब्धियों का उल्लेख होता है, कुछ नई योजनाएँ घोषित की जाती हैं, वर्तमान समस्याओं पर प्रकाश डाला जाता है, राष्ट्रीय और विदेशी नीतियों को स्पस्ट करते हुए भारत के विदेशों से अम्बन्धों की जानकारी दी जाती है। भाषण के अन्त में वह तीन बार जय हिन्द का नारा लगाता है। प्रधानमंत्री के लालकिले पर आगमन से पूर्व का तथा समारोह के समापन तक के सम्पूर्ण कार्यक्रम का आँखों-देखा हाल आकाशवाणी तथा दूरदर्शन से प्रसारित किया जाता है जिससे लाखों-करोड़ों लोग घर बैठे ही उसका आनन्द ले सकें तथा इस पावन पर्व पर भागीदारी व्यक्त कर सकें। रात्रि के समय प्रधानमंत्री अपने निवास-स्थान पर विशिष्ट लोगों के लिए भोज का आयोजन करते हैं; सरकारी भवनों-विशेषतः राष्ट्रपति भवन, केन्द्रीय सचिवालय, आकाशवाणी भवन पर रोशनी की जाती है। देश के अन्य प्रदेशों की  राजधानियों में भी लगभग यही कार्यक्रम-झंडा-आरोहण, भाषण, सलामी, रात्रि-भोज, रोशनी की जगमगहट होती है।

स्वतंत्रता दिवस खुशी का दिन भी है तथा भविष्य में राष्ट्र की रक्षा और उसे सुदृढ़ बनाने के संकल्प का दिवस भी है। यह आत्मचिन्तन, आत्ममंथन, आत्मविश्लेषण का दिन भी है। हम बलिदानियों-शहीदों को स्मरण भी करते हैं और यदि आवश्यकता पड़े तो स्वयं बलिदान होने का संकल्प भी लेते हैं।

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