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स्वास्थ्य ही सम्पत्ति है अथवा अच्छा स्वास्थ्य: महा वरदान – निबंध

बहुप्रचलित कहावत है:

पहला सुख निरोगी काया,
दूसरा सुख घर में हो माया।

अर्थात् जीवन को सुखी बनाने के लिए स्वस्थ शरीर और धन या सम्पत्ति आवश्यक हैं। इनमें भी धन की तुलना में स्वास्थ्य का महत्त्व अधिक है क्योंकि शरीर स्वस्थ होने पर ही हम जीवन में कुछ कर सकते हैं, धन अर्जित करना भी तभी सम्भव है जब शरीर स्वस्थ हो, ‘शरीरमाद्यम् खुलु धर्म साधयेत’। अंग्रेजी में कहावत है:

‘If health is lost something is lost, if wealth is lost nothing is lost.’

जीवन को सुखी बनाने के लिए सुख-साधन चाहिएँ अर्थात् सम्पदा प्राप्त करने के लिए स्वस्थ शरीर और स्वस्थ मन चाहिए। स्वस्थ शरीर के लिए आवश्यक है कफ, पित्त और वायु का साम्यावस्था में रहना तथा मानसिक स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है सतोगुण, रोजागुण एवं तमोगुणों की साम्यावस्था। अंग्रेजी में कहावत है: ‘Sound mind in sound body‘। शरीर स्वस्थ रहने पर ही मन-मस्तिष्क स्वस्थ रह सकते हैं। अतः स्वास्थ्य बहुमूल्य वस्तु है। इसीलिए अथर्ववेद में प्रार्थना की गयी है: “शरीर के सभी अंग-प्रत्यंग निरोग, स्वस्थ और सचेतन हों। मेरी सम्पूर्ण देह निर्दोष हो।”

वस्तुतः इस जीवन-यात्रा पर चलने के लिए हमारा शरीर रथ है और इन्द्रियाँ घोड़े। इसी रथ पर बैठकर हम जीवन-यात्रा करते हैं। यदि रथ के पहिए ढीले, कमजोर हों, कमानियों में दम न हो तो रथ नहीं चल पायेगा और हमारी जीवन-यात्रा बीच में ही समाप्त हो जायेगी, यमराज की विकराल दाढ़ें हमें चबा लेंगी।

यदि शरीर स्वस्थ है तो हम परिश्रम कर सकते हैं, प्रसन्न रहते है, अपने कर्त्तव्यों तथा दायित्वों का भली-भाँति निर्वाह कर सकते हैं। संस्कृत में उक्ति है: ‘वीर भोग्या वसुन्धरा‘। वीर वही हो सकता है जिसकी भुजाएँ, वक्ष, शरीर के सभी अंग स्वस्थ और पुष्ट हों। स्वस्थ शरीर होने पर हमारा मन-मस्तिष्क भी विवेक से, सद्बुद्धि से काम करता है और जो विवेक से, भली-भाँति सोच-समझ कर कार्य करते हैं, वे ही सफल, सुखी, सम्पन्न होते हैं।

इसके विपरीत जिसका शरीर रोगों से आक्रान्त है, जो अस्वस्थ हैं, जिनके अंग-प्रत्यंग शिथिल हैं, वे परिश्रम करना तो दूर सांस तक नहीं ले पाते, चल-फिर तक नहीं सकते, खटिया जोड़ते हैं, अपना और अपने परिवार-जनों का जीवन कष्टपूर्ण बना लेते हैं, उन्हें डाक्टरों और औषधियों में धन खर्च करना पड़ता है, जीने के लाले पड़ने लगते हैं। अस्वस्थ व्यक्ति का स्वभाव चिड़चिड़ा हो जाता है, उसकी सोचने-विचरने की शक्ति दुर्बल हो जाती है, उसे क्रोध बड़ी जल्दी आता है, मानसिक संतुलन बिगड़ जाता है। वह उल्टा-सीधा सोचता है और गलत निर्णय के कारण उल्टा-सीधा काम कर बैठता है। परिणाम होता है कि जो भी काम करता है उसमें हानि होती है, लक्ष्मी रूठ कर घर से विदा हो जाती है।

जीवन का प्रयोजन बताया गया है, “कुर्वन्नेवह कर्माणि जिजीवितेष शतं समाः” अर्थात् कर्म करते हुए कर्त्तव्यों का पालन करते हुए सौ वर्ष तक जियें। इस प्रयोजन की सिद्धि के लिए अच्छा स्वास्थ्य अनिवार्य है और स्वस्थ रहने के लिए व्यायाम, सन्तुलित और पौष्टिक भोजन, स्वच्छ जल, स्वच्छ वायु, प्रदूषण रहित वातावरण आवश्यक हैं। मादक पदार्थों का सेवन, दूषित, गन्दे, हिन, काम-वासना भरे विचार, क्रोध, ईर्ष्या, द्वेष, चिन्ता ये सब स्वास्थ्य के परम शत्रु हैं। अतः स्वास्थ्य के लिए हितकर आचरण अपनाकर तथा स्वास्थ्य के लिए घातक वस्तुओं से बचकर ही हम स्वस्थ रह सकते हैं और स्वस्थ रहकर अपना जीवन और परलोक दोनों सुधार सकते हैं। लक्ष्मी उन्हीं की सेवा करती है जो परिश्रमी, अध्यवसायी और उद्यम के लिए अच्छा स्वास्थ्य आवश्यक है। सुखी रहने के लिए दूसरी आवश्यक है स्वस्थ मन और वह सद्भावों तथा उदात्त विचारों को अपनाने से ही सम्भव है। अतः यदि सुखी रहना है तो स्वस्थ शरीर और स्वस्थ मन बनाने की साधना करो। दीर्घायु और सुखी-समृद्ध जीवन के लिए स्वस्थ-रूप सम्पत्ति ही एक मात्र उपाय है।

जीवन जागरण है, प्रगति का दूसरा नाम है। ‘चरैवेति चरैवेति‘ जीवन का मूल मंत्र है और इस मंत्र को वही अपना सकता है, उसके अनुसार वही व्यक्ति आचरण कर सकता है जो स्वस्थ है शरीर से भी और मन से भी। अतः स्वास्थ्य को सम्पत्ति कहना उचित ही है।

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