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बसन्त पंचमी पर हिन्दी निबंध विद्यार्थियों के लिए

बसन्त पंचमी पर हिन्दी निबंध विद्यार्थियों के लिए

भारत कृषिप्रधान देश है। यह प्राकृतिक शोभा का भंडार है। यहाँ जितने प्रकार के वृक्ष, पौधे, लता, गुल्म, फल-फूल उगते हैं अन्य किसी देश में नहीं होते। यहाँ छः ऋतुएँ – ग्रीष्म, वर्षा, शरद, शिशिर, हेमन्त और वसन्त होती हैं। इन सबमें बसन्त को ऋतुराज कहा गया है। इसके दो कारण हैं – प्रथम तो शिशिर और हेमन्त की कड़ाके की सर्दी का अन्त होने से मौसम सुहावना होने लगता है, सुनहरी धूप तन-मन को पुलकित करती है, सर्वत्र रंग-बिरंगे फूल खिलकर पृथ्वी रूपी युवती को रंगा-बिरंगा परिधान प्रदान कर उसकी सुंदरता बढ़ाते हैं और दूसरे रबी की फसल पकने लगती है – गेहूँ, जौ, चना मटर के पौधे सिर उठाकर नृत्य करने लगते हैं। सरसों की फसल भी प्रायः पकने लगती है। सरसों के खेतों में उसके पीले-पीले फूल सूर्य की किरणों का स्पर्श पाकर सम्पूर्ण वातावरण को पीताभ-सुनहरा बना देते हैं। लगता है प्रकृति ने वसुन्धरा को पिली चादर उढ़ाकर अलंकृत कर दिया है। सरसों का रंग ही नहीं उसके फूलों की सुगन्ध भी इस ऋतु का महक बना देती है। फूलों के कारण जहाँ तक दृष्टि जाती है पिला ही पिला दिखाई देता है और खेतों में हवा के झोकों के साथ लहराते नन्हे-नन्हे पीले फूल परियों के बच्चों की तरह नाचते – थिरकते दृष्टिगोचर होते हैं। सारा वातावरण महकने लगता है और यह महक इतनी मादक होती है कि किशोर-किशोरी, युवक-युवती ही नहीं व्यस्क लोग भी तन-मन में एक नई स्फूर्ति, उमंग, काम-भावना अनुभव करने लगते हैं। इसीलिए फागुन की हवा को बावरी, मस्त बना देनेवाली हवा जाता है। अपने मन के उल्लास और तन की धमनियों में तीव्र होते रक्त-संचार के कारण युवक-युवतियाँ प्रकृति के साथ एकाकार होने के लिए पीले-पीले वस्त्र पहनते हैं। सरसों के पीले फूलों, युवक-युवतियों के पीले वस्त्रों के कारण लगता है पीले रंग का सागर ही चारों ओर लहरा रहा है। उसी के साथ समरसता स्थापित करने के लिए गृहणियाँ पाकशाला में पीले रंग के स्वादिष्ट व्यंजन तैयार करती हैं-किसी घर में केसरिया पुलाव पकता है तो किसी घर में इसी रंग का हलुवा बनाया जाता है। हलवाइयों की दूकानों पर भी पीले रंग की स्वादिष्ट मिठाइयों के थाल दिखने लगते हैं। बसन्त ऋतु का आगमन फाल्गुन मास के शुक्लपक्ष की पंचमी को होता है, अतः उसका स्वागत करने के लिए ही इस तिथि को उत्सव मनाया जाता है।

बसन्त पंचमी मुख्यतः ऋतु-पर्व है, सुहावनी ऋतु के आगमन पर उसका स्वागत करने के लिए मनाया जानेवाला त्यौहार है। धर्म, पूजा-अर्चना, देवता के प्रति कृतज्ञता प्रकट करना भारतीय संस्कृति का अभिन्न अंग है। अतः बसन्त पंचमी के प्रति कृतज्ञता प्रकट करना भारतीय संस्कृति का अभिन्न अंग है। अतः बसन्त पंचमी के दिन पुरुष और विशेषकर महिलाएँ प्रातःकाल स्नान कर मन्दिरों में भजन-पूजन, देवता को प्रसाद चढ़ाकर अपनी कृतज्ञता प्रकट करने जाते हैं, कुछ लोग व्रत और उपवास भी रखते हैं। साहित्यकार इसे साहित्य, कला की अधिष्ठात्री देवी सरस्वती के पूजन का दिन मानकर देवी सरस्वती की पूजा-अर्चना करते हैं। हिन्दी भाषा-भाषियों के लिए इसका महत्त्व और भी बढ़ जाता है क्योंकि इसी दिन हिन्दी छायावादी कविता के मूर्धन्य कवि महाप्राण सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला का जन्म हुआ था। अतः उनके जन्मदिन को मनाने के लिए संगीत, कविता-पाठ, निराला के व्यक्तित्व और कृतित्व पर प्रकाश डालने वाली संगोष्ठियों-सभाओं का आयोजन होता है।

भारतवासियों को त्यौहार मनाने के लिए, मौज-मस्ती करने के लिए कोई बहाना चाहिए, वे किसी अवसर को खोना नहीं चाहते। अतः बसन्त पंचमी के दिन भी मेले लगाये जाते हैं। सारे भारत में विशेषतः उत्तर भारत में नदियों, सरोवरों के तटों पर या खुले मैदान में बसन्त पंचमी का मेला लगाया जाता है। इन मेलों में आमोद-प्रमोद के लिए झूले, सर्कस लगाये जाते हैं, दुकानों पर तरह-तरह के खिलौनों और अन्य वस्तुओं को खरीदनेवालों की भीड़ लग जाती है। धार्मिक वृत्ति के लोग स्नान, मंदिरों में पूजा करने के बाद दान-दक्षिणा भी देते हैं।

बसन्त पंचमी का दिन एक करुण ऐतिहासिक घटना से भी जुड़ा है। इतिहास के अनुसार इसी दिन हकीकतराय नामक एक बालक को ऐतिहासिक घटना से भी जुड़ा है। इतिहास के अनुसार इसी दिन हकीकतराय नामक एक बालक को तत्कालीन मुसलमान शासक ने धर्म-परिवर्तन कर इस्लाम धर्म स्वीकार करने के लिए प्रलोभन दिये, डराया-धमकाया, मौत की सजा देने की बात कहकर आतंकित भी किया, पर उस किशोर ने धर्म-परिवर्तन की बजाय मरना स्वीकार किया और क्रूर आततायी कट्टर मुसलमानों ने उस भोले-भाले किशोर की हत्या कर दी। उसकी पावन स्मृति में पंजाब-हरियाणा में यह दिन शहीद-दिवस के रूप में भी मनाया जाता है। पर कुल मिलाकर बसन्त पंचमी ऋतु पर्व है, सांस्कृतिक त्यौहार है और वह सम्पूर्ण भारत में हिन्दुओं द्वारा मनाया जाता है। यह प्रकृति की शोभा से उल्लसित मन के आह्लाद को प्रकट करनेवाला, कामदेव की पूजा का प्रतिक पर्व है।

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