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वृक्ष की आत्मकथा पर विद्यार्थियों और बच्चों के लिए निबंध

संस्कृत और हिन्दी के अनेक सुभाषितों में परोपकार की महिमा गयी है – ‘परोपकाराय सत्तां विभूतयः‘,’पर हित सरिस धर्म नहिं भाई‘ ऐसी ही उक्तियाँ हैं। इनमें कहा गया है कि नदियाँ अपना जल नहीं पीतीं, दूसरों की प्यास बुझाती हैं, रत्नगर्भा पृथ्वी अपने रत्न और अन्य धातुएँ दूसरों के उपयोग और अलंकरण के लिए उगलती है, वसुन्धरा धरती अपना सीना चीर कर जिन वनस्पतियों, औषधियों को जन्म देती है वे मनुष्यों के रोगों को दूर करने, उन्हें हृष्ट-पुष्ट बनाने, उन्हें स्वस्थ रखने के लिए काम में आते हैं। ये सभी पदार्थ मानवजाति का, पशु-पक्षियों हित करते हैं। इनमें सर्वोपरी त्यागी, बलिदानी, कष्टसहिष्णु, परोपकारी है वृक्ष। एक तो मेरे सभी अंग-प्रत्यंग-जड़ें, तना, शाखाएँ, डालियाँ, टहनियाँ, पत्ते, फूल, फल सब मनुष्य का हित करते हैं तथा दूसरे मैं इतना उदार, इतना सहृदय, इतना क्षमाशील हूँ कि अपकार का बदला उपकार से देता हूँ। मनुष्य मेरे शरीर पर कुल्हाड़ी, आरी, छैनी, हथौड़े से प्रहार करता है, मेरे अंग-भंग करता है, मुझे क्षत-विक्षत करता है, मुझ पर ईट-पत्थर बरसाता है, मुझे जलता है, परन्तु मैं इन सब दुष्कृत्यों, पीड़ा, यातनाओं को सहकर भी सदा से दूसरों का हित करता आया हूँ और करता रहूँगा।

मैं सभी प्राणियों का विश्राम-स्थल हूँ। सृष्टि के आरम्भ में जब मकान तो क्या झोपड़ी भी नहीं थी तब मनुष्य मेरी शाखाओं के हरे-भरे पत्तों और उनकी शीतल छाया के नीचे विश्राम करता था, रात को हिंसक पशुओं से अपनी रक्षा करने के लिए मेरी शाखाओं पर बसेरा डालता था। आज भी यात्री जब चलते-चलते थक जाते हैं, सूर्य के ताप से विकल हो उठते हैं, पशु चरानवाले पशु चराते-चराते विश्राम की आवश्यकता अनुभव करने लगते हैं, पेट में चूहे कूदने लगते हैं, किसान जब हल चलाते-चलाते या खेतों में पानी देते-देते थक जाते हैं, तो मेरी शीतल छाया  में आकर हीं भोजन करते हैं, विश्राम करते हैं और जब थकन दूर हो जाती है, शरीर में स्फूर्ति आ जाती है तो पुनः अपने कार्य में लग जाते हैं। पक्षियों का तो मैं स्थायी आवास-स्थल हूँ। वे मेरी शाखाओं पर ही अपने नीड़ों का निर्माण करते हैं और सपरिवार रहते हैं। प्रकृति ने मुझे वरदान दिया है कि मैं नाइट्रोजन खाऊँ और बदले में आक्सीजन दूँ। यह आक्सीजन जिसे प्राणवायु कहते हैं सृष्टि का अस्तित्व बनाये हुए है। उसके अभाव में मनुष्य, पशु, पक्षी, वनस्पतियाँ सब नष्ट हो जायेंगी। आज के वैज्ञानिक और औद्योगिकरण के युग में वायु-प्रदूषiणसंक्रामक रोग से भी अधिक घातक बन गया है, उसके कारण अनेक रोग, अनेक व्याधियाँ जन्म ले रही हैं। मैं पृथ्वी के पर्यावरण में सन्तुलन बनाये रखने और वायु-प्रदुषण को करने के लिए सदा प्रयास करता रहता हूँ। मेरे पत्ते मवेशियों का चारा बनकर  तथा गदेदार तथा रसदार फल मनुष्य का आहार बनकर न केवल उनकी क्षुधा शान्त करते हैं, अपितु उनके शरीर को निरोग, स्वस्थ, हृष्टपुष्ट भी रखते हैं। मेरे पुष्पों की सुगन्धि से वातावरण महकने लगता है। कोई उनका प्रयोग अपनी शोभा, अपना सौन्दर्य बढ़ाने के लिए करता है, कोई देवता को प्रसन्न करने के लिए इन्हें देवता के चरणों में चढ़ता है, कोई इन्हें कुचलकर, भट्टी में तपाकर इत्र बनाता है और बेचकर धन कमाता है। मेरे फूल यदि शरीर का श्रृंगार  करते हैं तो मेरी लकड़ी से बनी हुई हस्त-कौशल की चीजें और फर्नीचर घरों का अलंकरण करते हैं, उनकी सुन्दरता को चार चांद लगते हैं। मेरी बनी खटिया या पलंग पर लेटकर तथा कुर्सी पर बैठकर लोग आराम करते हैं। विद्यालयों में काम आनेवाला फर्नीचर-कुर्सी, डैस्क, मेज, बैन्च आदि भी मेरी ही लकड़ी से बनता है। ईंधन की समस्या को हल करनेवाला मैं प्रमुख साधन हूँ।

मेरे अनेक नाम हैं – वृक्ष, पेड़, दरख्त आदि। मेरी अनेक जातियाँ-प्रजातियाँ हैं। रंग-रूप, आकार-प्रकार भी अनेक हैं। कोई ठिगना-बौना है तो कोई गगनचुम्बी। कोई छायादार है तो कोई नारियल की तरह छायाविहीन ‘पंछी को छाया नहीं  फल लागे अति दूर।” परन्तु मेरी दो विशेषताएँ हैं –  मेरा अस्तित्व सारे विश्व में है और मैं सबका हित करता हूँ। याद रखिए कि मैंने अपने स्वरूप को पाने के लिए बड़ी साधना  की  है, तपस्या की है, कष्ट झेले हैं। मैं नहीं जनता कि मुझे किसने जन्म दिया। ऐसे गुणवान, परोपकारी जीव को मनुष्य तो जन्म दे नहीं सकता। अतः लगता है कि प्रकृति ने ही मुझे जन्म दिया है। यह तो है उस वृक्ष की कथा जो जातिवाचक संज्ञा कहलाता है। अब मेरी निजी व्यक्तिगत कथा सुनिए।

मेरा नाम देवदार है। देवदार का अर्थ है देवताओं का वृक्ष। मेरे इस नाम के पीछे दो कारण हैं – एक तो मैं हिमालय पर रहता हूँ जो देवताओं का निवास-स्थान माना जाता है, दूसरे मुझमें दवताओं के से गुण हैं। मेरी कष्ट-कथा जन्म लेने और होश सम्भालने से पूर्व ही आरम्भ हो जाती है। धरती की कोख में रहते समय मेरा  दम घुटा है, मैंने धरती का ताप सहा है, पृथ्वी के गर्भ में होती रहनेवाली रासायनिक क्रियाओं की पीड़ा झेली है, सड़ा हूँ, गला हूँ। जन्म लेने के बाद क्रमशः अंकुर, पौधा और वृक्ष का रूपाकार धारण करने के बाद भी अनेक कष्ट सहे हैं – कभी तूफान, बवंडर, आँधी, कभी मुसलाधार वर्षा, कभी बाढ़ सबके द्वारा दी गयी यातनाएँ झेलता रहा हूँ। इन सबके बाद ही मुझे मेरा वर्तमान स्वरूप मिला है।

मनुष्य के व्यवहार से मैं बहुत क्षुब्ध रहा हूँ और आज भी हूँ क्योंकि वे मेरी जाती, मेरे वंश का सर्वनाश करने में जुटे हैं। इन मूर्खों को, विवेकहीनों को पता नहीं कि मेरे अस्तित्व के  साथ उनका अस्तित्व जुड़ा हुआ है। मुझे काटकर वे अपने पैरों में आप कुल्हाड़ी मार रहे हैं। हाँ, मैं कवियों, गद्य-लेखकों, चित्रकारों का आभारी हूँ। उन्होंने  मेरी प्रशंसा में कविताएँ लिखी हैं, मुझसे सीख लेने का उद्बोधन दिया है, मेरे प्रति हुए अन्याय के लिए अपने संगी-साथियों के कान खींचे  हैं, प्रतारणा की है, मुझे विषय बनाकर निबंध लिखे हैं जैसे अशोक के फूल, कुटज आदि। चित्रकारों ने अपनी तुलिका से मेरे सुन्दर चित्र बनाये हैं। मैं पृथ्वी-पुत्र हूँ और अपना कर्तव्य-दायित्व समझता हूँ। ईश्वर से प्रार्थना है कि वह मुझे अपना दायित्व निबाहने की सदा शक्ति प्रदान करता रहे।

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